मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ५४२ | मृच्छकटिकम् |
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चारुदत्तः— ननु मम प्रत्यक्षं न गता; तन्न जाने किं पद्भ्यां गता, उत प्रवहणेनेति।
(प्रविश्य सामर्षो वीरकः।)
पादप्पहार-परिभव-विमाणणा-बद्धगुरुअ-वेरस्स।
अणुसोअन्तस्स इमं कधं पि रत्ती पभादा मे॥ २३ ॥
(पाद-प्रहार-परिभव-विमानना-बद्ध-गुरुक-वैरस्य।
अनुशोचत इयं कथमपि रात्रिः प्रभाता मे॥ २३ ॥)
ता जाव अधिअरणमण्डवं उवसप्पामि। (प्रवेष्टकेन) सुहं अज्जमिस्साणं? (तद् यावदधिकरणमण्डपमुपसर्पामि।) (सुखम् आर्यमिश्राणाम्?)
अधिकरणिकः— अये ! नगररक्षाधिकृतो वीरकः। वीरक ! किमाग-
चारुदत्त— वास्तव में मेरे सामने नहीं गयी, अतः मैं यह नहीं जानता हूँ कि पैदल गयी अथवा गाड़ी से ?
अन्वयः— पादप्रहारपरिभवविमाननावद्धगुरुकवैरस्य, अनुशोचतः, मे, इयम्, रात्रिः, कथमपि, प्रभाता ॥२३॥
शब्दार्थ— पादप्रहारपरिभवविमाननावद्धगुरुकवैरस्य=पैर से मारने के अनादर से होने वाली अवज्ञा से जनित बहुत बड़ी शत्रुता वाले, अनुशोचतः=लगातार सोच करने वाले, मे=मेरी (वीरक की), इयम्=यह, रात्रिः=रात, कथमपि=किसी प्रकार, प्रभाता=सवेरा बन गयी ॥२३॥
अर्थ— (क्रोध के साथ प्रवेश करके)
वीरक— (चन्दनक के) पैर के मारने के अनादर से होने वाली अवज्ञा से जनित बहुत बड़ी शत्रुता वाले निरन्तर सोचने वाले मेरी (वीरक भी) यह रात (ही) किसी प्रकार सवेरा बन गयी ॥२३॥
टीका— चन्दनपादप्रहारापमानितो वीरको न्यायालये समागत्य स्वव्यथां प्रतिपादयति-पादेति। पादप्रहारेण=चरणाघातेन चन्दनकस्येति शेषः, यः परिभव = अनादरः, तेन या विमानना=अवज्ञा, तया बद्धम्=उत्पादितम् गुरुकम्=महत्, वैरम्=शत्रुत्वं यस्य तादृशस्य, अनुशोचतः=तद्विषयेऽनवरतं चिन्तयतः, मे=मम, वीरकस्येत्यर्थः, इयम्=तदैव व्यतीता, रात्रिः=निशा, प्रभाता=अतीता, सूर्योदयोऽभवदिति भावः। गाथा नाम वृत्तम् ॥२३॥
अर्थ— तो अब न्यायालय में जाता हूँ। (प्रवेश करके) विद्वानों! आप लोगों का कल्याण है।
अधिकरणिक— अरे ! नगर की रक्षा के लिये नियुक्त वीरक। वीरक !