मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽङ्कः १४७
अपि च--
योऽहं लतां कुसुमितामपि पुष्पहेतो- राकृष्य नैव कुसुमावचयं करोमि। सोऽहं कथं भ्रमरपक्षरुचौ सुदीर्घे केशे प्रगृह्य रुदतीं प्रमदां निहन्मि ? ॥ २८ ॥
से अन्धा ( विवेकशून्य ), दूसरे को मारने का विचार रखने वाला जो व्यक्ति अपनी स्वाभाविक दुष्टता के कारण झूठ ही बोलता है, क्या वह स्वीकार करने योग्य ही होता है ? वह विचार करने योग्य नहीं होता है ? ॥ २७ ॥
टीका—दुर्जनवचनानि प्रमाणीकृत्य कस्यापि अपराधित्वस्वीकरणमनुचितमिति प्रतिपादयति—इहेति। इह=अत्र, न्यायालये लोके वा, परगुणेषु=अन्यगुणेषु, मत्सरी=विद्वेषी, परगुणासहनशील इत्यर्थः, दुष्टात्मा=नीचप्रकृतिः, मनुष्यः=नरः, रागान्धः=कामिन्यादिविषयासक्त्या अन्धः=सदसद्विवेकशून्यः, सन्, परम्=अन्यम्, हन्तुकामबुद्धिः=हन्तुम्=नाशयितुम्, कामः=इच्छा यस्यास्तादृशी बुद्धिः=मतिः यस्य सः, जातिदोषात्=नीचप्रकृतिदोषात्, मृषा=असत्यम्, एव, यत्, वदति=कथयति, तत्=दुष्टवचनम्, ग्राह्यम्=स्वीकार्यम्, भवति किम् ? नैव स्वीकार्यमिति भावः, तत्=तादृशवचनम्, न=नैव, विचारणीयम्=विचारयोग्यम् ? अपि तु विचारणीयमेव। विचारं कृत्वैव तत्र निर्णयो विधेय इति तद्भावः। अत्राप्रस्तुतप्रशंसालंकारः, प्रहर्षिणी वृत्तम् ॥ २७ ॥
अन्वयः—यः, अहम्, कुसुमिताम्, लताम्, अपि, पुष्पहेतोः, आकृष्य, पुष्पावचयम्, न, करोमि, सः, अहम्, भ्रमरपक्षरुचौ, सुदीर्घे, केशे, प्रगृह्य, रुदतीम्, प्रमदाम्, कथम्, निहन्मि ॥ २८ ॥
शब्दार्थ—यः=जो, अहम्=मैं, चारुदत्त, कुसुमिताम्=फूली हुई, लताम्=लता को, अपि=भी, पुष्पहेतोः=फूल (तोड़ने) के लिये, आकृष्य=खींचकर, पुष्पावचयम्=फूलों का चयन, न=नहीं, करोमि=करता हूँ, सः=वह, [ इतना अधिक भावुक ], अहम्=मैं, चारुदत्त, भ्रमरपक्षरुचौ=भौरों के पंखों की कान्ति के समान कान्ति वाले, सुदीर्घे=बहुत लम्बे, केशे=बालों में ( बालों को ), प्रगृह्य=खींचकर, पकड़ कर, रुदतीम्=रोती हुई, प्रमदाम्=नवयुवती को, निहन्मि=बलपूर्वक मारता हूँ ? अर्थात् नहीं मार सकता हूँ ॥ २८ ॥
अर्थ—और भी
जो मैं फूली हुई लता को भी फूल [तोड़ने] के लिये खींचकर फूल नहीं तोड़ता हूँ वही मैं भौरों के पंखों के समान कान्ति वाले काले लम्बे लम्बे बालों को पकड़ कर रोती हुई नवयुवती को कैसे मार सकता हूँ ? अर्थात् नहीं मार सकता हूँ ॥ २८ ॥