भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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५४८ | मृच्छकटिकम्

शकारः— हंहो अधिअलणभोइआ ! किं तुम्हे पक्खवादेण व्यवहालं पेक्खध, जेण अज्जवि एशे हदाशचालुदत्ते आशणे घालीअदि ? (हंहो अधिकरणभोजकाः ! किं यूयं पक्षपातेन व्यवहारं पश्यत, येन अद्यापि एष हताश-चारुदत्त आसने धार्यते ? )

अधिकरणिकः— भद्र शोधनक ! एवं क्रियताम् ।

(शोधनकस्तथा करोति ।)

चारुदत्तः— विचार्यतां भो अधिकृताः ! विचार्यताम् । ( इत्यासनादवतीर्य भूमावुपविशति ।)

शकारः— ( स्वगतम् । सहर्षं नर्त्तित्वा ) ही अणेण मए कड़े पावे अण्णइश


टीका— आत्मनो निर्दोषतां साधयितुमाह - य इति । यः=दयालुस्वभावः, अहम्=चारुदत्तः, कुसुमिताम्=सञ्जातपुष्पाम्, लताम्=व्रततिम्, अपि, पुष्पहेतोः=पुष्पग्रहणार्थम्, आकृष्य=आकृष्टां कृत्वा, पुष्पावचयम्=पुष्पाणां चयनम्, नैव=न, करोमि=विदधामि, सः=पूर्वोक्तदयालुस्वभावः, भ्रमरपक्षरुचौ=अलिपंखतुल्यनीले, सुदीर्घे=अतिविशाले, केशे=कुन्तले, अवच्छेदार्थे आश्लेषार्थे वा सप्तमी, प्रगृह्य=बलपूर्वकमाकृष्य, रुदतीम्=विलपन्तीम्, प्रमदाम्=नवयुवतिम्, कथम्=केन प्रकारेण, निहन्मि=घातयामि, न कथमपीति तद्भावः । अत्र काव्यलिङ्गमलंकारः, वसन्ततिलकं वृत्तम् ॥ २८ ॥

विमर्श— चारुदत्त अपनी अतिकोमल प्रकृति का वर्णन करते हुये सिद्ध करना चाहता है जो व्यक्ति लता तक को नहीं खींच सकता वह कोमलांगी नवयौवना वसन्तसेना को, बालों को खींचकर, मार डालेगा, यह सम्भावना ही नहीं करनी चाहिये ॥ २८ ॥

शब्दार्थ— पक्षपातेन=पक्षपात के साथ, धार्यते=बैठाया हुआ है, नर्तित्वा=नाच कर, निपातितम्=लगा दिया, सिद्ध कर दिया ।

अर्थ -- शकार— हे मान्यवर न्यायाधिकारियों ! क्या आप लोग पक्षपात करके मुक़दमा का विचार कर रहे है, जिससे अभी भी यह अधम चारुदत्त कुर्सी पर बैठाया गया है ?

अधिकरणिक— भद्र शोधनक ! ऐसा करो अर्थात् चारुदत्त को आसन से उतार दो ।

( शोधनक वैसा ही करता है, चारुदत्त को आसन से हटा देता है । )

चारुदत्त— न्यायाधिकारियो ! विचार करिये ।

( यह कह कर आसन से उतर कर जमीन पर बैठ जाता है । )

शकारः— (अपने में, हर्षपूर्वक नाच कर) हा, हा, मैंने अपना किया हुआ

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