भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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नवमोऽङ्कः ५४९

मत्थके णिवडिदे ता जहिं चालुदत्ताके उवविशदि, तहिं हग्गे उवविशामि। (तथा कृत्वा) चालुदत्ता ! पेक्ख पेक्ख मं, ता भण भण मए मालिदे त्ति। (ही, अनेन मया कृतं पापमन्यस्य मस्तके निपातितम्। तद् यत्र चारुदत्त उपविशति, तस्मि-न्नहमुपविशामि।) (चारुदत्त ! प्रेक्षस्व, प्रेक्षस्व माम्, तद् भण भण मया मारितेति।)

चारुदत्तः—भो अधिकृताः !। ("दुष्टात्मा" इति ९।२७ पूर्वोक्तं पठति। सनिःश्वासं स्वगतम्)

मैत्रेय भोः ! किमिदमद्य ममोपघातो
हा ब्राह्मणि ! द्विजकुले विमले प्रसूता।
हा रोहसेन ! नहि पश्यसि मे विपत्तिं
मिथ्यैव नन्दसि परव्यसनेन नित्यम् ॥ २६ ॥

पाप दूसरे (चारुदत्त) के सिर पर लगा दिया। इस लिये जहाँ चारुदत्त बैठा था, वहाँ मैं बैठता हूँ। (वहाँ बैठ कर) चारुदत्त ! मुझे देखो, देखो, और कहो, कहो कि मैंने मार डाली।

अन्वयः--भो मैत्रेय !, इदम् किम् ? अद्य, मम, उपघातः, [समागतः], हा, ब्राह्मणि !, विमले, द्विजकुले, प्रसूता, [असि], हा रोहसेन ! मे, विपत्तिम्, न हि, पश्यसि, परव्यसनेन, नित्यम्, मिथ्या, एव, नन्दसि ॥२६॥

शब्दार्थ--भो मैत्रेय !=हे मित्र मैत्रेय !, इदम्=यह (सामने होने वाला), किम्=क्या है ? अद्य=आज, मम=मेरा, उपघातः=अनिष्टपात, विनाश, (समागतः=आ गया है।), हा=हाय, ब्राह्मणि=ब्राह्मणि ! (मेरी प्रिय पत्नि), विमले=निष्कलंभ, कुले=वंश में, प्रसूता=उत्पन्न हुई हो, हा रोहसेन !=हाय बेटा रोहसेन !, मे=मुझ चारुदत्त की, विपत्तिम्=प्राणदण्डरूप कष्ट को, न हि=नहीं, पश्यसि=देख रहे हो, परव्यसनेन=केवल बालक सुलभ खेलकूद से, नित्यम्=रोजाना, मिथ्या एव=झूठ ही, नन्दसि=खुश रहते हो ॥ २६ ॥

**अर्थ--चारुदत्त--**हे न्यायाधीशो ! ('दुष्टात्मा परगुणमत्सरी' इत्यादि पूर्वोक्त २७ वां श्लोक पढ़ता है। निःश्वासपूर्वक अपने आप में-)

हे मैत्रेय ! यह क्या ? आज मेरा विनाश (आ गया है)। हाय ब्राह्मणि ! तुम निष्कलंक ब्राह्मणकुल में पैदा हुई हो। (किन्तु तुम्हारा पति कलंकी होकर मारा जा रहा है।) हाय बेटा रोहसेन ! मेरी (मृत्युदण्डरूप) विपत्ति को नहीं देख रहे हो। रोजाना केवल खेलकूद से ही झूठ में आनन्दित होते हो। (तुम्हें आने वाले कष्ट का आभास नहीं है।) ॥२९॥

टीकाः--साम्प्रतं विपत्तिसागरे निमग्नश्चारुदत्तः स्वजनसम्बोधनपूर्वकं विलपन्नाह—मैत्रेयेति। भो मैत्रेय=मित्र मैत्रेय !, इदम्=समक्षमुपस्थितमकल्पितम्,