मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽङ्कः १५७
श्रेष्ठिकायस्थौ-- (विलोक्य वसन्तसेनामातरमुद्दिश्य) अवहिता दाव अज्जा एदं सुवण्णभण्डअं अवलोएदु, सो ज्जेव एसो ण वेत्ति। (अवहिता तावत् आर्या एतत् सुवर्णभाण्डकमवलोकयतु तदेवेदं न वेति।)
वृद्धा-- (अवलोक्य) सरिसो एसो, ण उण सो। (सदृशमेतत्, न पुनस्तत्।)
शकारः- आं बुद्धकुट्टिणि! अक्खीहि मन्तिदं वाआए मूकितं। (आं वृद्धकुट्टनि! अक्षिभ्यां मन्त्रितं वाचा मूकितम्।)
वृद्धा हदास! अवेहि। (हताश! अपेहि।)
श्रेष्ठिकायस्थौ--अप्पमत्तं कधेहि, सा ज्जेव एसो ण वेत्ति। (अप्रमत्तं
अत्र शकारो भौमेन, चारुदत्तो वृहस्पतिना, विदूषककक्षपतिताभूषणानि धूमकेतुना तुल्यानि प्रतीयन्ते इति भावः। अत्र न्यायाधिकरणिकाः प्रयतमाना अपि चारुदत्त-रक्षणेऽसमर्था इति तन्मरणमवश्यम्भावि मन्यन्ते इति बोध्यम्। अत्राप्रस्तुतेनानेन अङ्गारकविरुद्धवृहस्पतेः पार्श्वे धूमकेतुग्रहसदृशग्रहान्तरोदयवर्णनेन प्रस्तुतस्य शकारा-भियुक्तचारुदत्तस्य वसन्तसेनाऽलङ्कारपातरूपप्रमाणोप-स्थितिबोधादप्रस्तुतप्रशंसेय-मलङ्कृतिः, सा च धूमकेतुरिवेत्युपमया सङ्कीर्यते-इति जीवानन्दः। पध्यावक्त्रं वृत्तम्॥ ३३॥
विमर्श- यहाँ ज्योतिषशास्त्रोक्त दुर्योग का वर्णन है। मंगल विरोधी हो, बृहस्पति क्षीण हो पास में धूमकेतु का उदय हो तो अनिवार्यतया अनिष्ट होता है। यहाँ क्रूरस्वभाववाला शकार मंगल और सात्त्विक वृत्ति वाला चारुदत्त क्षीणशक्ति वाला बृहस्पति माना गया है। विदूषक की काँख से अचानक गहनों का गिर जाना धूमकेतु ग्रह का उदय माना गया है। प्रबल कुयोग में चारुदत्त का मृत्युदण्ड सुनिश्चित है, यह भाव है॥ ३३॥
शब्दार्थ- अवहिता = सावधान, मन्त्रितम् = धीरे से कह दिया, मूकितम् = नहीं कहा, छिपा दिया, अप्रमत्तम् = ठीक तरह, साफ साफ, अवबध्नाति = आकृष्ट करता है, अनभिज्ञातः = न जाना हुआ।
अर्थ--श्रेष्ठी और कायस्थ- (देखकर वसन्तसेनाकी माता को लक्षित करके) आर्या आप सावधान होकर इस सुवर्ण-आभूषणसमूह को देखिये, क्या वही है अथवा नहीं ?
वृद्धा- (देखकर) समान तो है लेकिन वही नहीं है।
शकार- अच्छा बूढ़ी कुट्टिनी! आँखों से कह दिया किन्तु वाणी से छिपा लिया। [नहीं कहा।]
वृद्धा- अभागे! दूर हट जा।