मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३५८ | मृच्छकटिकम् |
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कथय, स एव एष न वेति ।)
वृद्धा--अज्ज ! सिप्पिकुशलशाये ओबन्धेदि दिट्टिं, ण उण सो।
( आर्य ! शिल्पि कुशलतया अवबध्नाति दृष्टिम्, न पुनस्तत् । )
अधिकरणिकः--भद्रे ! अपि जानासि एतान्याभरणानि ?
वृद्धा--णं भणामि,-णहु णहु अणभिजाणिदो अहवा कदावि सिप्पिणा घड़िदो भवे । ( ननु भणामि--न खलु न खलु अनभिज्ञातः, अथवा कदापि शिल्पिना घटितो भवेत् । )
अधिकरणिकः--पश्य श्रेष्ठिन् ! ।
वस्त्वन्तराणि सदृशानि भवन्ति नूनं
रूपस्य भूषणगुणस्य च कृत्रिमस्य ।
दृष्ट्वा क्रियामनुकरोति हि शिल्पिवर्गः
सादृश्यमेव कृतहस्ततया च दृष्टम ॥ ३४ ॥
श्रेष्ठी ओर कायस्थ --सावधान होकर कहिये -- यह वही है अथवा नहीं ।
वृद्धा--मान्यवर ! कारीगर की कुशलता के कारण आँख को आकृष्ट करता है किन्तु वही नहीं है।
अधिकरणिक--भद्रे ! आप इन गहनों को जानती हैं ?
वृद्धा--मैं कहती हूँ कि अपरिचित नहीं है अथवा कदाचित् कारीगर ने बना दिया होगा ।
**अन्वयः--**कृत्रिमस्य, रूपस्य, भूषणगुणस्य, च, सदृशानि, वस्त्वन्तराणि नूनम्, भवन्ति, हि, शिल्पिवर्गः, दृष्ट्वा, क्रियाम्, अनुकरोति, कृतहस्ततया, एव, च, सादृश्यम्, दृष्टम् ॥ ३४ ॥
**शब्दार्थ--**कृत्रिमस्य=बनावटी, रूपस्य=रूप के, च=और, भूषणगुणस्य=गहने की सुन्दरता आदि गुण के, सदृशानि=समान, वस्त्वन्तराणि=दूसरी चीजें, नूनम्=निश्चित रूप से, भवन्ति=होतीं ही हैं, हि=क्योंकि, शिल्पिवर्गः=कारीगरों का समुदाय, दृष्ट्वा=देखकर, क्रियाम्=बनावट का, अनुकरोति=नकल कर लेता है, च=और, कृतहस्ततया=हाथ के कौशल के कारण, एव=ही, सादृश्यम्=समान-रूपता, दृष्टम्=देखी जाती है ॥ ३४ ॥
अर्थ--अधिकरणिक--सेठ जी ! देखिये--
बनावटी [ बनाये गये ] रूप और गहने की सुन्दरता के समान दूसरी चीजें [ गहने आदि ] होतीं ही हैं क्योंकि कारीगर लोग बनाये गये काम [ आभूषण आदि ] को देखकर उसकी नकल कर लेते हैं । और हाथ की कुशलता के कारण ही सादृश्य देखा जाता है ॥ ३४ ॥