भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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नवमोऽङ्कः ५६३

शकारः—वावादिदा । अले ! तुमं पि भण—'मये वावादिता' त्ति ।
( व्यापादिता । अरे ! त्वमपि भण—'मया व्यापादिता' इति )
चारुदत्तः—त्वयैवोक्तम् ।
शकारः—शुणेध शुणेध भट्टालका ! एदेण मारिदा, एदेण ज्जेव संशए छिण्णे । एदश्श दलिद्दचारुदत्तश्श शलीले दण्डे घालीअदु ।
( शृणुत, शृणुत भट्टारकाः ! एतेन मारिता, एतेनैव संशयश्छिन्नः । एतस्य दरिद्रचारुदत्तस्य शारीरो दण्डो धार्यताम् । )
अधिकरणिकः—शोधनक ! यथाह राष्ट्रियः । भो राजपुरुषाः ! गृह्यतामयं चारुदत्तः ।

( राजपुरुषाः गृह्णन्ति । )

वृद्धा—पसीदन्तु पसीदन्तु अज्जमिस्सा (जो तदाणि चोरेहिं अवहिदस्स इत्यादिपूर्वोक्तं पठति ।) ता जदि वावादिदा मम दारिआ, वावादिदा, जीवदु मे दीहाऊ । अण्णं च—अत्थि-पच्चत्थिणं ववहारो, अहं अत्थिणी, ता मुञ्चध एदं । ( प्रसीदन्तु, प्रसीदन्तु आर्यमिश्राः ! तद् यदि व्यापादिता मम


**विमर्श—**इसी नवम अंक में श्लोक संख्या ३० में भी यही श्लोक है । दोनों में कुछ पाठभेद हैं । वहाँ भी इस की व्याख्या की जा चुकी है । 'परलोकम्' के स्थान पर 'लोकद्वयम्' यह पाठ अधिक अच्छा है। क्योंकि स्त्रीवध का दण्ड यहाँ भी मिलना है और परलोक में भी । 'स्त्रीरत्नञ्च' के स्थानपर 'स्त्रीरत्निश्च' ऐसा भी पाठ है । यहाँ चारुदत्त मृत्यु की इच्छा करने लगता है । अतः पद्य में कुछ अन्तर स्वाभाविक है ॥३८॥

**शब्दार्थः—**व्यापादिता=मार डाली, छिन्नः=दूर कर दिया, शारीरः=शरीर-सम्बन्धी, आरा आदि से शरीर को काटना, दारिका=कन्या, अर्थिप्रत्यर्थिनोः=वादी-प्रतिवादी का, आत्मनः सदृशम्=अपनी इच्छा के अनुरूप ॥

**अर्थ—शकार—**मार दिया । अरे तुम भी कहो 'मैंने मार दिया ।'
**चारुदत्त—**तुम्हीं ने कहा है ।
**शकार—**महाशयों ! सुनिये सुनिये ! इसीने मार डाला । इसी ने संदेह ( भी ) दूर कर दिया । इस दरिद्र चारुदत्त को शारीरिक दण्ड दीजिये ।
**अधिकरणिक—**शोधनक ! जैसा राजा के शाले ने कहा है ( वैसा करो ) । इस चारुदत्त को पकड़ लो ।

( सिपाही पकड़ लेते हैं । )

**वृद्धा—**माननीय विद्वानों ! प्रसन्न हो जाइये, प्रसन्न हो जाइये । यदि मारा है तो मेरी पुत्री को मारा है। मेरा दीर्घायु जीवित रहे । दूसरी बात यह है कि