भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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नवमोऽङ्कः ५६६

विष-सलिल-तुलाग्नि-प्रार्थिते मे विचारे क्रकचमिह शरीरे वीक्ष्य दातव्यमद्य । अथ रिपुवचनात्त्वं ब्राह्मणं मां निहंसि पतसि नरकमध्ये पुत्रपौत्रैः समेतः ॥४३॥

अयमागतोऽस्मि ।

( इति निष्क्रान्ताः सर्वे । )

॥ इति व्यवहारो नाम नवमोऽङ्कः ॥


अन्वयः---विषसलिलतुलाग्निप्रार्थिते, मे, विचारे, ( सति ), वीक्ष्य, अद्य, इह, शरीरे, क्रकचम्, दातव्यम्, अथ रिपुवचनात् वा, ब्राह्मणम्, माम्, निहंसि, ( तदा ), पुत्रपौत्रैः, समेतः, नरकमध्ये, पतसि ॥४३॥

शब्दार्थः---विषसलिलतुलाग्निप्रार्थिते=विष, जल, तराजू और आग के द्वारा परीक्षा करने योग्य, मे=मेरे ( चारुदत्त के ), विचारे=मुकदमा का निर्णय, ( सति=रहने पर ) वीक्ष्य=अच्छी तरह देख कर, समझ कर, अद्य=आज, इह=इस, ( मेरे ) शरीरे=देह पर, क्रकचम्=आरा, दातव्यम्=चलाना चाहिये, देना चाहिये । अथ=अगर, रिपुवचनात्=शत्रु शकार के कहने से, वा=ही, ब्राह्मणम्=ब्राह्मण, माम्=मुझ चारुदत्त को, निहंसि=मार डालते हो, ( तदा=तब ) पुत्रपौत्रैः=पुत्र तथा पौत्रों के, समेतः=साथ, नरकमध्ये=नरक के बीच में, पतसि=गिरते हो, गिरोगे ॥ ४३ ॥

अर्थ--चारुदत्त-- ( करुणापूर्वक 'मैत्रेय भोः ! किमिदमद्य' इत्यादि (९।२६) श्लोक पढ़ता है । आकाश की ओर - )

विष, पानी, तराजू और आग से ( मेरे द्वारा ) परीक्षा के लिये प्रार्थित मेरे मुकदमे के निर्णय में ठीक प्रकार से विचार करके आज मेरे शरीर पर आरा चलवाना चाहिये । यदि शत्रु शकार के वचन से ही मुझ ब्राह्मण को मार डालते हो तो पुत्र तथा पौत्र आदि के साथ नरक के बीच में गिरोगे ॥ ४३ ॥

यह मैं आ गया ।

( इस प्रकार सभी निकल जाते हैं । )

॥ व्यवहार-नामक नवम अंक समाप्त हुआ ॥

**टीका--**निरपराधस्यापि स्वस्य मृत्युदण्डविधाने सर्वेषां नरकपतनमिति आक्रोशं प्रकटयन्नाह — विषेति । विषेण=गरलेन, गरलपानेनेत्यर्थः, सलिलेन=जलेन, जलनिमज्जनेनेत्यर्थः, तुलया=तुलाख्यपरिमापकयन्त्रेण, तुलोपरि समारोपणेनेत्यर्थः,