मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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अग्निना=वह्निना, अग्निमध्ये निक्षेपेण अग्निग्रहणेन वेत्यर्थः प्रार्थितः=याचितः, परीक्षणार्थं मया इति शेषः, तादृशे, पूर्वोक्तपदार्थैः ममापराधस्य निर्णयो विधेय इति मया प्रार्थिते, मे=मम, चारुदत्तस्य, विचारे=मयि आरोपितस्यापराधस्य तत्त्वनिर्णये सतीत्यर्थः, यदि मयि पापं न स्यात्तदा पूर्वोक्तैः परीक्षितोऽहं न मरिष्यामीति तद्भावः, वीक्ष्य=विशेषेण विचार्य, अद्य-अस्मिन् दिने, इह=अस्मिन्, शरीरे=मम देहे, क्रकचम्=करपत्रम्, काष्ठकर्तनयन्त्रविशेषः 'आरा' इति हिन्द्याम्, दातव्यम्=दातुमुचितम्, तेन मम शरीरं कर्तनीयमिति भावः । यदि सम्यक् परीक्षामकृत्वैव मृत्युदण्डविधानं क्रियते तदाऽक्रोशं व्यनक्ति--अथ=यदि, रिपुवचनात्=रिपोः शकारस्य कथनात्, वा=एव, ब्राह्मणम्=सदाचारिणं निरपराधं विप्रम्, माम्=चारुदत्तम्, निहंसि=मारयसि, तदा, पुत्रपौत्रै.=पुत्रैः तत्पुत्रैश्चेत्यर्थः भाविसन्ततिभिरिति भावः समेतः=सहितः, नरकमध्ये=नरकस्याभ्यन्तरे, पतसि=गच्छसि, गमिष्यसीत्यर्थः, वर्तमानसामीप्ये लटः प्रयोगः । निरपराधस्य दण्डदाने नरक-पतनमाह मनुः--
'अदण्ड्यान् दण्डयन् राजा दण्ड्यांश्चैवाप्यदण्डयन् ।
अयशो महदाप्नोति नरकं चैव गच्छति ॥' मनुः ८।१२८।।
अत्र काव्यलिङ्गमलङ्कारः, मालिनी वृत्तम् ।। ४३ ।।
।। इति नवमोऽङ्कः ।।
विमर्श प्राचीनकाल में अपराधी का निर्णय करने के लिये दिव्य परीक्षा प्रचलित थी । (१) विष खिलाने पर भी मृत्यु का न होना । (२) पानी में डुबाने पर भी न मरना । (३) बराबर का वजन रखने पर भी उसके द्वारा चढ़ा हुआ पलड़ा ऊपर हो जाना (४) हाथ पर पीपल आदि के पत्ते रखकर जलता हुआ आग का गोला रखने पर भी हाथ का न जलना--ये किसी के निर्दोष होने में प्रमाण माने जाते थे । चारुदत्त के कथनानुसार उसने इनके द्वारा अपनी परीक्षा की प्रार्थना की थी । किन्तु शकार की बातों को ही सब कुछ मान कर उसे मृत्युदण्ड दे दिया गया है । वह अपने को निर्दोष मानता है । अतः उसे दण्ड देने वाले राजा की तीनों पीढ़ियां तक नरक भोगेंगी--यह शाप देता है ।
तत्कालीन न्याय-प्रणाली और आज की न्यायप्रणाली समान सी प्रतीत होती है । गम्भीरतापूर्वक निर्णय लेना उस समय भी सम्भव नहीं था ।। ४३ ।।
।। इस प्रकार जय-शङ्कर-लाल-त्रिपाठि-विरचित संस्कृत-हिन्दी-व्याख्या में मृच्छकटिक का नवम अङ्क समाप्त हुआ ॥