मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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चाण्डालः । तत् परलोकार्थं पुत्रमुखं द्रष्टुमभ्यर्थये ।
**चाण्डालौ—**एव्वं कलोअदू । ( एवं क्रियताम् । )
( नेपथ्ये )
हा ताद ! हा आवुक ! ( हा तात ! हा पितः ! )
( चारुदत्तः श्रुत्वा सकरुणम् 'भोः स्वजातिमहत्तर !' इत्यादि पठति । )
**चाण्डालौ—**अले पउला ! खणं अन्तंलं देध । एशे अज्जचालुदत्ते पुत्तमूहं पेक्खदु । ( नेपथ्याभिमुखम् ) अज्ज इदो इदो, आअच्छ ले दालआ ! आअच्छ । (अरे पौराः ! क्षणमन्तरं दत्त । एष आर्यचारुदत्तः पुत्रमुखं प्रेक्षताम् ।) ( आर्य ! इत इतः । आगच्छ रे दारक ! आगच्छ । )
( ततः प्रविशति दारकमादाय विदूषकः । )
**विदूषकः—**तुवरदु तुवरदु भद्दमुहो, पिदा दे मारिदुं णीअदि । ( त्वरतां त्वरतां भद्रमुखः, पिता ते मारयितुं नीयते । )
**दारकः—**हा ताद ! हा आवुक ! । ( हा तात ! हा पितः । )
**विदूषकः—**हा पिअवअस्स ! ! कहिं मए तुमं पेक्खिदव्वो ? ( हा प्रियवयस्य ! कस्मिन् मया त्वं प्रेक्षितव्यः ? )
पालक के समान चाण्डाल नहीं है । इस लिये परलोक के लिये पुत्र का मुख देखने की प्रार्थना करता हूँ ।
**दोनों चाण्डाल—**ऐसा ही करिये ।
( नेपथ्य में )
हाय पिता जी ! हाय मित्र !
( चारुदत्त सुनकर करुणासहित "हे अपनी जाति के प्रमुख पुरुष !" इत्यादि पढ़ता है । )
**दोनों चाण्डाल—**अरे नगरवासियों ! कुछ खाली जगह दो । यह आर्य चारुदत्त पुत्र का मुख देख ले । ( नेपथ्य की ओर देख कर ) आर्य ! इधर आओ इधर, आ लड़के ! आ । )
( इसके बाद बच्चे को लेकर विदूषक प्रवेश करता है । )
**विदूषक—**भद्रमुख ! जल्दी करो, जल्दी करो, तुम्हारे पिता मारे जाने के लिये ले जाये जा रहे हैं ।
**लड़का—**हाय तात ! हाय जनक ! ।
**विदूषक—**हाय प्रिय मित्र ! ( अब ) तुम्हें मैं कहाँ देख पाऊँगा ?