भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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५८८ मृच्छकटिकम्

( इति यज्ञोपवीतं ददाति । )

चाण्डालः-- आअच्छ ले चालुदत्ता ! आअच्छ । ( आगच्छ रे चारुदत्त ! आगच्छ । )

द्वितीयः-- अले ! अज्जचालुदत्तं णिलुववदेण णामेण आलवशि ? अले ! पेक्ख । ( अरे ! आर्यचारुदत्तं निरुपपदेन नाम्ना आलपसि ? अरे ! प्रेक्षस्व । )

अब्भुदए अवशाणे तहेअ लत्तिन्दिवं अहदमग्गा ।
उद्दामे व्व किशोली णिअदी क्खु पडिच्छिदुं जादि ॥ १६ ॥
( अभ्युदयेऽवसाने तथैव रात्रिन्दिवमहतमार्गा ।
उद्दामेव किशोरी नियतिः खलु प्रतीष्टं याति ॥ १६ ॥ )


शब्दार्थ-- ( यज्ञोपवीतम्=जनेऊ ), ब्राह्मणानाम्=ब्राह्मणों का, अमौक्तिकम्=मोतियों से नहीं बनाया गया, असौवर्णम्=सोने से नहीं बनाया गया, विभूषणम्=गहना, है, येन=जिसके द्वारा, देवतानाम्=देवताओं का, च=और, पितॄणाम्=पितरों का, भागः=अंश, प्रदीयते=दिया जाता है ॥ १८ ॥

अर्थ-- बेटे को क्या दूँ ? ( अपने को देखकर, जनेऊ को देख कर ) हाँ, यह तो है। और मेरा--

( यह जनेऊ ) ब्राह्मणों का बिना मोतियों के बनाया गया, बिना सोने के बनाया गया गहना है जिससे देवताओं और पितरों का भाग प्रदान किया जाता है ॥ १८ ॥

( यह कह कर जनेऊ दे देता है । )

टीकाः-- यज्ञोपवीतं नाम ब्राह्मणानां सर्वस्वं तदेव पुत्राय दातव्यमिति प्रति-पादयन्नाह—अमौक्तिकमिति । ब्राह्मणाम्=विप्राणाम्, अमौक्तिकम्=मुक्ताद्यनिर्मि-तम्, असौवर्णम्=सुवर्णादिनाऽनिष्पन्नम्, विभूषणम्=आभूषणम् अस्ति यज्ञोपवीत-मिति शेषः । येन=यद्द्वारा, देवतानाम्=सुराणाम्, पितॄणाम्=पूर्वजानाम्, च, भागः=अंशः, प्रदीयते=समर्प्यते । उपनयनानन्तरमेव द्विजत्वमवाप्य दैवकर्मसु पितृकर्मसु चाधिकारो लभ्यत इति भावः । अतः यज्ञोपवीतं विप्रस्य परमोपकारकं वस्त्विति इदं पुत्राय ददामीत्यर्थः, पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ १८ ॥

अर्थ--चाण्डाल-- आ रे चारुदत्त ! आ ।

अन्वयः-- अभ्युदये, तथैव, अवसाने, रात्रिन्दिवम्, अहतमार्गा, नियतिः, उद्दामा, किशोरी, इव, खलु, इष्टम्, प्रति, याति ॥ १६ ॥

शब्दार्थ-- अभ्युदये=सम्पत्ति में, तथैव=उसी प्रकार, अवसाने=विपत्ति में, रात्रिन्दिवम्=दिन रात, अहतमार्गा=बिना रोक टोक के चलने वाली, नियतिः=

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