मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽङ्कः ५८६
अण्णं च---शुक्खा ववदेशा शे किं पणमिअ मत्थए ण काअव्वं ।
लाहुगहिदे वि चन्दे ण वन्दणीए जणपदश्श ? ॥ २० ॥
( अन्यच्च--शुष्का व्यपदेशा अस्य किं प्रणम्य मस्तके न कर्त्तव्यम् ।
राहुगृहीतोऽपि चन्द्रो न वन्दनीयो जनपदस्य ? ॥ २० ॥ )
भाग्य, उद्दामा=स्वच्छन्दचारिणी, किशोरी=नव युवती, इव=के समान, खलु=निश्चितरूप से, इष्टम्=मन चाहे के, प्रति=समीप, याति=जाती है ॥ १९ ॥
अर्थ--दूसरा चाण्डाल-अरे ! चारुदत्त को विना उपाधि लगाये बुला रहा है। अरे, देख, देख --
सम्पत्ति में और उसी प्रकार विपत्ति में दिनरात विना रोक टोक चलने वाली किस्मत ( भाग्य ) स्वच्छन्दचारिणी नवयुवती के समान निश्चितरूप से इष्ट ( मन चाहे ) के पास चली जाती है ॥ १९ ॥
**टीका--**सर्वगुणसम्पन्नमपि नियतिवशाद् दुखमापन्नं चारुदत्तं सावज्ञं न सम्बोधनीयमित्याह द्वितीयश्चाण्डालः -अभ्युदय इति । अभ्युदये=सम्पत्तौ, तथैव=तद्वदेव, अवसाने=अभ्युदयनाशे, विपत्तावित्यर्थः, रात्रिन्दिवम्=अहर्निशम्, अहत-मार्गा=अप्रतिहतगतिका, नियतिः=भाग्यम्, उद्दामा=उच्छृङ्खला, स्वच्छन्दचारिणी-त्यर्थः, किशोरी=नवयुवतिः, इव=यथा इष्टम्=अभीष्टं स्थानम् पक्षे पुरुषं प्रति याति=गच्छति । अतः नियतिवशादधुना विपन्नस्य चारुदत्तस्यानादरोऽस्माभिर्नो विधेय इति तद्भावः । उपमालंकार, आर्या वृत्तम् ॥ १९ ॥
**अन्वय--**अस्य, व्यपदेशाः, शुष्काः, किम्, प्रणम्य, मस्तके, न, कर्तव्यम् ? चन्द्रः, राहुगृहीतः, अपि, जनपदस्य, वन्दनीयः, न ? ॥ २० ॥
**शब्दार्थ--**अस्य=इस ( चारुदत्त ) के, व्यपदेशाः=कुलनाम आदि, शुष्काः=सूख गये, किम्=क्या ? प्रणम्य=प्रणाम करके, झुककरके, मस्तके=मस्तक पर, शिरु पर, न=नहीं, करणीयम्=करना चाहिये ? चन्द्रः=चन्द्रमा, राहुगृहीतः=राहु से पकड़ा गया, ग्रसित हुआ, अपि=भी, जनपदस्य=जनपद के लोगों का, वन्दनीयः=वन्दना करने योग्य, न=नहीं, होता है ? अर्थात् अवश्य होता है ॥ २० ॥
अर्थ--और भी--
इस ( चारुदत्त ) के कुलनाम आदि भी सूख गये ( नष्ट हो गये ) क्या ? अर्थात् नष्ट नहीं हुये । प्रणाम करके इस ( इसके गुणों ) को सिर पर नहीं करना चाहिये क्या ? अर्थात् इसे अवश्य सम्मान देना चाहिये । चन्द्रमा राहु द्वारा पकड़ा जाने पर क्या जनपद के लोगों के लिये वन्दनीय नहीं होता है अर्थात् होता है ॥२०॥
**टीका--**पूर्वश्लोकोक्तमेवाभिप्रायं शब्दान्तरेण प्रतिपादयन्नाह--शुष्का इति । अस्य=अमुष्य चारुदत्तस्येत्यर्थः, व्यपदेशाः=कुलनामादयः, शुष्काः=नष्टाः, किम् ?