भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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५९२ मृच्छकटिकम्

दारकः-- ता कीस मारेध आवुकं ? ( तत् केन मारयथः पितरम् ? )
चाण्डालः-- दीहाओ ! अत्त लाअणिओओ क्खु अबलज्झदि, ण क्खु अम्हे । ( दीर्घायुः ! अत्र राजनियोगः खलु अपराध्यति, न खलु आवाम् । )
दारकः-- वावादेध मं, मुञ्चध आवुकं । ( व्यापादयतं माम्, मुञ्चतं पितरम् । )
चाण्डालः-- दीहाओ ! एवं भणन्ते चिलं मे जीव । ( दीर्घायुः ! एवं भणन् चिरं मे जीव । )
चारुदत्तः-- ( सास्त्रं पुत्रं कण्ठे गृहीत्वा )

इदं तत् स्नेहसर्वस्वं सममाढ्यदरिद्रयोः ।
अचन्दनमनौशीरं हृदयस्यानुलेपनम् ॥ २३ ॥

मानाय भवति । अतो न वयं निन्द्याः । निन्द्यास्तु राजपुरुषा एव, यैर्निरपराधोऽपि सज्जनः चारुदत्तः साम्प्रतं वधस्थानं संप्रेष्य वधायादिष्ट इति तद्भावः ॥२२॥

विमर्श-- चारुदत्त के पुत्र रोहसेन के मुख से 'रे रे चाण्डालाः' ऐसा सम्बोधन सुन कर चाण्डाल दुःखी हो जाता है और यह कहना चाहता है कि हम लोग तो केवल चाण्डालकुल में पैदा होने से ही चाण्डाल कहे जाते हैं । हमारे काम दूसरों को कष्ट देना नहीं है । वास्तव में चाण्डाल वे ही हैं । पापी भी वे ही हैं जो निरपराध सत्पुरुष को अपमानित करते हैं । झूठा आरोप लगा कर मृत्युदण्ड आदि देते या दिलवाते हैं । अतः हम लोग निर्दोष हैं ॥२२॥

अर्थ--बालक-- तो पिता को क्यों मारते हो ?
चाण्डाल-- चिरञ्जीविन् ! यहाँ राजा की आज्ञा ही अपराधी है न कि हम लोग ।
बालक-- तो मुझे मार डालो, मेरे पिता को छोड़ दो ।
चाण्डाल-- दीर्घायु ! ऐसा कहते हुये तुम बहुत दिनों तक जीवित रहो ।

अन्वयः-- तत्, इदम्, आढ्यदरिद्रयोः, समम्, स्नेहसर्वस्वम्, हृदयस्य, अचन्दनम्, अनौशीरम्, अनुलेपनम् ॥२३॥

शब्दार्थ-- तत् = वह लोकप्रसिद्ध, इदम् = यह सामने विद्यमान पुत्ररूपी वस्तु, आढ्यदरिद्रयोः = धनी और गरीब का, समम् = बराबर का, स्नेहसर्वस्वम् = वात्सल्यरस का सारभूत, है, हृदयस्य = हृदय का, अचन्दनम् = बिना चन्दन का, अनौशीरम् = बिना खस का, अनुलेपनम् = विलेपन की चीज है ॥२३॥

अर्थ--चारुदत्त-- ( आँसुओं के साथ पुत्र को गले लिपटा कर ) —
वह ( लोकप्रसिद्ध ) यह ( पुत्र रूपी वस्तु ) धनी और गरीब दोनों का समानरूप से वात्सल्यरस का सारभूत है, हृदय का, बिना चन्दन और बिना खस का, लेपन द्रव्य है ॥२३॥

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