भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 683, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 683

दशमोऽङ्कः ५९५

( ततः प्रविशति प्रासादस्थो बद्धः स्थावरकः । )

स्थावरकः- ( घोषणामाकर्ण्य सर्वक्लव्यम् ) कथं अपावे चलुदत्ते वावादीअदि ! हग्गे णिअलेण शामिणा बन्धिदे। भोदु, आक्कन्दामि। शुणाध अज्जा ! शुणाध, एत्थ दाणि मए पावेण पवहणपड़िवत्तेण पुप्फकल्लण्डअजिण्णुज्जाणं वशन्तशेणा णीदा, तदो मम शामिणा 'मं ण कामेशि' त्तिकडुअ बाहुपाशवलक्कालेण मालिदा, ण उण एदिणा अज्जेण । कथं विद्दूलदाए ण कोवि शुणादि ? ता किं कलेमि ? अत्ताणं पाडेमिं । ( विचिन्त्य ) जइ एव्वं कलेमि, तदा अज्जचारुदत्ते ण वावादीअदि। भोदु, इमादो पाशा-


को, व्यथयति=व्यथित कर रही है, यत्=कि, इदम्=यह, श्रोतव्यम्=सुनना पड़ रहा है 'असौ=यह, ( वसन्तसेना ), मया=मैने ( चारुदत्त ने ) हता'=मार डाली ॥२५॥

अर्थ--चारुदत्त-- मैं विपत्ति के कारण इस गर्हित दशा को प्राप्त हुआ हूँ जिसमें जीवन की समाप्ति यह फल भी हुआ है और यह घोषणा मेरे मन को व्यथित कर रहीं हैं कि "मैंने वसन्तसेना मारी है।" ॥ २५ ॥

टीका--'चारुदत्तेनार्थकल्यवर्त्तस्य कारणात् वसन्तसेना हता' इत्यादिघोषणां श्रोतुमसमर्थश्चारुदत्तो विलपन्नाह—प्राप्त इति। अहम्=चारुदत्तः, व्यसनेन=विपदा कृशाम्=क्षीणाम्, शोचनीयामित्यर्थः, दशाम्=अवस्थां, दुर्दशामित्यर्थः, प्राप्तः=उपगतः यत्र=यस्यां दशायाम्, इदम्=एतत् अनुभवविषयीभूतम्, जीवितावसानम्=जीवनस्य परिसमाप्तिः, प्राणदण्डरूपम्, फलमपि=परिणामोऽपि, जात इति शेषः, एषा च=सर्वैः श्रूयमाणा, च, घोषणा=अपवादकथनपूर्वकं दण्डकथनम्, मे=मम, मनः=चित्तम्, व्यथयति=पीडयति, यत्=यस्मात्, इदम्=इत्थम्, श्रोतव्यम्=आकर्णनीयम्, वसन्तसेना=तन्नाम्नी गणिका मया=चारुदत्तेन, हता=मारिता । या मम प्राणभूता आसीत् सा मयैव हतेति श्रोतुमसमर्थोऽपि विवशतया शृणोमीति भावः । प्रहर्षिणी वृत्तम् ॥ २५ ॥

**शब्दार्थ--**प्रासादस्थः=महल में स्थित, बन्द, सर्वक्लव्यम्=विकलता के साथ, अपापः=पापरहित, निरपराध, आक्रन्दामि=चिल्लाता हूँ। प्रवहणपरिवर्तनेन=गाड़ी बदल जाने से, विद्रूरतया=बहुत दूर होने के कारण, निक्षिपाभि=गिराता हूँ, उपरतः=मरा हुआ, वासपादपः=रहने का वृक्ष=स्थान, दण्डनिगडैः=बन्धन की बेड़ियाँ, अन्तरम् अन्तरम्=जगह, जगह ( दीजिये ) ।

अर्थ-- ( इसके बाद प्रासाद में स्थित बंधा हुआ स्थावरक प्रवेश करता है । )

स्थावरक-- ( घोषणा सुनकर व्याकुलता के साथ ) क्या निष्पाप (निरप-