मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ५९६ | मृच्छकटिकम् |
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दवालग्ग-पदोलिकादो एदिणा जिण्णगवक्खेण अत्ताणं णिक्खिवामि। वरं हग्गे उवलदे, ण उण एशे कुलपुत्तविहगाणं वाशपादवे अज्जचालदत्ते। एव्वं जइ विवज्जामि, लद्धं मए पललोए। (इत्यात्मानं पातयित्वा) ही ही ! ण उवलदम्हि। भग्गे मे दण्डणिअले। ता चाण्डालघोशं शमण्वेशाभि। (दृष्ट्वा उपसृत्य) हंहो चाण्डाला! अन्तलं अन्तलं। (कथमपापश्चारुदत्तो व्यापाद्यते? अहं निगडेन स्वामिना बद्धः। भवतु, आक्रन्दामि। शृणुत आर्याः! शृणुत, अत्र इदानीं मया पापेन प्रवहणपरिवर्तेन पुष्पकरण्डकजीर्णोद्यानं वसन्तसेना नीता, ततो मम स्वामिना 'मां न कामयसे' इति कृत्वा बाहुपाशबलात्कारेण मारिता, न पुनरेतेन आर्येण। कथं विदूरतया न कोऽपि शृणोति? तत् किं करोमि? आत्मानं पातयामि!) (यद्येवं करोमि, तदा आर्य चारुदत्तो न व्यापाद्यते। भवतु, अस्याः प्रासादबालाग्रप्रतोलिकातः एतेन जीर्णगवाक्षेण आत्मानं निक्षिपामि। वरमहमुपरतो न पुनरेष कुलपुत्रविहगानां वासपादप आर्यचारुदत्तः। एवं यदि विपद्ये, लब्धो मया परलोकः।) (ही ही! नोपरतोऽस्मि। भग्नं मे दण्डनिगडः। तच्चाण्डालघोषं समन्विष्यामि।) (हंहो चांडालौ! अन्तरमन्तरम्।)
चाण्डालौ—अले ! के अन्तलं मग्गेदि? (अरे ! कः अन्तरं याचते ?)
(चेटः शुणाध—इति पूर्वोक्तं पठति।)
राध) चारुदत्त मारा जा रहा है? मैं स्वामी शकार के द्वारा बेड़ियो से बाँध दिया गया हूँ। अच्छा चिल्लाता हूँ। सुनिये सज्जनों! सुनिये, मुझ पापी ने गाड़ी बदल जाने के कारण वसन्तसेना पुष्पकरण्डक जीर्णोद्यान में पहुँचा दी थी। इसके बाद मेरे मालिक शकार ने 'मुझे नहीं चाहती हो' ऐसा कह कर बाहुपाश द्वारा बलपूर्वक [गला दबा कर] मार डाली थी, इस सज्जन (चारुदत्त) ने नहीं। क्या, बहुत अधिक दूरी के कारण कोई नहीं सुन पा रहा है? तो क्या करूँ? अपने आप को (यहाँ से) गिराता हूँ। (सोच कर) यदि ऐसा करता हूँ तो आर्य चारुदत्त नहीं मारा जायगा। अच्छा, इस महल की नई बनी हुई ऊँची अट्टालिकावाली गली से इस पुरानी खिड़की (झरोखे) से अपने को [नीचे] गिराता हूँ, मैं मरा हुआ ही अच्छा, न कि कुलपुत्ररूपी पक्षियों के रहने का स्थान [वृक्ष] यह आर्य चारुदत्त [मरा हुआ]। यदि ऐसे मर जाता हूँ तो स्वर्गलोक प्राप्त करूँगा। (अपने आपको गिरा कर) ओह, मैं नहीं मरा। मेरी बन्धन की बेड़ियाँ टूट गयीं। अतः चाण्डालों की घोषणा-स्थान का पता लगाता हूँ। (देख कर और पास जाकर) हे हे चाण्डालो! जगह दो जगह दो।'
दोनों चाण्डाल—कौन खाली जगह माँग रहा है?
(चेट—'सुनिये सज्जनों!' इत्यादि पूर्वोक्त वचन कहता है।)