मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽङ्कः ५६६
चाण्डालौ—थावलअ ! अवि शच्चं भणाशि ? ( स्थावरक ! अपि सत्यं भणसि ? )
चेटः —शच्चं । हग्गे वि, ‘मा कश्श वि कथइश्शशि’त्ति पाशादवालग्गप-दोलिकाए दण्डणिअलेण बन्धिअ णिक्खित्ते । ( सत्यम् । अहमपि, ‘मा कस्यापि कथयिष्यसी’ति प्रासादबालाग्र-प्रतोलिकायां दण्डनिगडेन बद्ध्वा निक्षिप्तः । )
शकारः— ( प्रविश्य सहर्षम् । )
मंशेण तिक्खामिलिकेण भत्ते शाकेण शूपेण शमच्छकेण ।
भुत्तं मए अत्तणअश्श गेहे शालिश-कूलेण गुलोदणेण ॥ २६ ॥
( मांसेन तिक्ताम्लेन भक्तं शाकेन सूपेन समत्स्यकेन ।
भुक्तं मया आत्मनो गेहे शालीयकूरेण गुडौदनेन ॥ २६ ॥ )
( शकार ) के द्वारा विष से बुझाये गये वाण के समान दूषित ( कलंकित ) कर दिया गया हूँ ॥२८॥
टीका—सर्वेषां पुरतः आत्मनो निर्दोषत्वं प्रतिपादयति—तेनेति । न कृतम्= विहितम् वैरम्= शत्रुत्व यस्य तेन, मया कदापि अननुष्ठितविरोधाचरणेनेत्यर्थः, क्षुद्रेण= तुच्छेन, अत्यल्पा=अतिमन्दा बुद्धिः= मतिः, यस्य तेन, अतिमन्दमतिना मूर्खेणेत्यर्थः, दूषितेन= दोषयुक्तेन, अपि, तेन= शकारेण कर्त्रा, विषाक्तेन= विष-दग्धेन, शरेण= वाणेन, इव= यथा, दूषितः= कलङ्कितः, अस्मि— जातोऽस्मीत्यर्थः । यद्वा—‘अस्मि’ इदमहमर्थे अस्मि= अहम् दूषितः= कलङ्कित इत्यर्थः, अकारणमेव वैरिभूतेन अज्ञानिना तेन शकारेणाहं मिथ्यैव दोषी साधित इति भावः । अत्रोपमा-लंकारः, पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥२८॥
अर्थ—दोनों चाण्डाल—स्थावरक ! सही कह रहे हो क्या ?
**स्थावरक—**सच । ‘किसी से मत कहना’ इस लिये मुझे भी महल की नयी अटारीवाली गली के ऊपर, डण्डों की बेड़ी से बांधकर डाल दिया था ।
**अन्वयः—**मया, आत्मनः, गेहे, तिक्ताम्लेन, मांसेन, शाकेन, समत्स्यकेन, सूपेन, शालीयकूरेण, गुडौदनेन, भक्तम्, भुक्तम् ॥२६॥
**शब्दार्थ—**मया=मैंने ( शकार ने ) आत्मनः=अपने, गेहे=घर में, तिक्ताम्लेन=कड़वे और खट्टे, मांसेन=मांस से, शाकेन=सब्जी से, समत्स्यकेन=मछली के साथ, सूपेन=दाल से, शालीयकूरेण=अगहन में पैदा होने वाले धान के चावल के भात से, गुडौदनेन=गुड़ और चावल से, भक्तम्=भात, भुक्तम्=खाया है ॥२६॥
अर्थ—शकार—( प्रवेश करके हर्षसहित )
मैंने अपने घर में कड़वे और खट्टे मांस, शाक, मछलीसहित दाल, अगहनी धान के चावल का भात तथा गुड़ से मिले हुये भात को खाया है ॥२६॥