भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 689, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 689

दशमोऽङ्कः ६०१

कधं थावलके चेड वि णत्थि इध ? मा णाम तेण इदो गदुअ मन्तभेदे किदे भविश्शदि ? ता जाव णं अण्णेशामि । ( भिन्नकांस्यवत्खङ्खनाया-श्चाण्डालवाचायाः स्वरसंयोगः, यथा च एष उद्गीतो बध्यडिण्डिमशब्दः पटहानाञ्च श्रूयते, तथा तर्कयामि, दरिद्रचारुदत्तो वध्यस्थानं नीयत इति । तत् प्रेक्षिष्ये । शत्रुविनाशो नाम महान् हृदयस्य परितोषो भवति । श्रुतञ्च मया, योऽपि किल शत्रुं व्यापाद्यमानं प्रेक्षते, तस्य अन्यस्मिन् जन्मान्तरे अक्षिरोगो न भवति । मया खलु विषग्रन्थिगर्भप्रविष्टेनेव कीटकेन किमपि अन्तरं मार्गयता उत्पादितस्तस्य दरिद्र-चारुदत्तस्य विनाशः । साम्प्रतमात्मीयायां प्रासाद-बालाग्र-प्रतोलिकायामधिरुह्य आत्मनः पराक्रमं प्रेक्षे । ) ( हीही ! एतस्य दरिद्र-चारुदत्तस्य वध्यं नीयमानस्य एतावान् जनसंमर्दः; यस्यां वेलायामस्मादृशः प्रवरो वरमनुष्यो वध्यं नीयते, तस्यां वेलायां कीदृशो भवेत् ? ) ( कथमेष स नव-बलीवर्द इव मण्डितो दक्षिणां दिशं नीयते । अथ किं निमित्तं मदीयायाः प्रासादबालाग्र-प्रतोलिकायाः समीपे घोषणा निपतिता निवारिता च ? कथं स्थावरकचेटोऽपि नास्तीह ? मा नाम तेन इतो गत्वा मन्त्रभेदः कृतो भविष्यति । तद् यावदेनमन्विष्यामि । )

( इति अवतीर्य उपसर्पति । )

चेटः—( दृष्ट्वा ) भट्टालआ ! एशे शे आगदे । ( भट्टारकाः ! एष स आगतः । )


मिलता है। और मैंने सुना है-मारे जाते हुये शत्रु को जो देखता है उसे अगले दूसरे जन्म में आँखों का रोग नहीं होता है। विषवृक्ष की गाँठ में घुसे हुये कीड़े के समान कोई मार्ग ( उपाय ) ढूढ़ते हुये मैंने उस दरिद्र चारुदत्त की मौत बना दी । अब अपनी महल की ऊँची अटारी में बैठकर अपना पराक्रम देखूंगा । ( वैसा करके और देख कर ) ओह ! इस दरिद्र चारुदत्त को फाँसी की जगह ले जाते समय लोगों की इतनी भारी भीड़, जिस समय मेरा जैसा महान श्रेष्ठ पुरुष फाँसी की जगह ले जाया जायगा उस समय कितनी अधिक भीड़ होगी ? ( देखकर ) क्या वह चारुदत्त नये बैल ( सांड़ ) की तरह सजाया हुआ दक्षिण दिशा की ओर ले जाया जा रहा है। लेकिन मेरे महल के नवीन अग्रभाग के पास घोषणा हुई और क्यों बन्द हो गयी ? ( देख कर ) क्या, यहाँ ( महल के ऊपरी कमरें में ) स्थावरक चेट भी नहीं है ? कहीं ऐसा न हो कि वह यहाँ से जाकर रहस्य खोल दे, तो तब तक इस की खोज करता हूँ ।

( ऐसा कह कर उतर कर पास में जाता है । )

चेट—( देखकर ) मालिको ! यह वह [ शकार ] आ गया ।