मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽङ्कः ६०३
शकारः—णहि लअणकुम्भशदिशे हग्गे इत्थिअं वावादेमि । ( नहि रत्नकुम्भसदृशोऽहं स्त्रियं व्यापादयामि ! )
सर्वे—अहो ! तुए मारिदा, ण अज्जचारुदत्तेण । ( अहो ! त्वया मारिता, न आर्यचारुदत्तेन । )
शकारः—के एव्वं भणादि ? ( क एवं भणति ? )
सर्वे—( चेटमुद्दिश्य ) णं एशो साहू । ( नन्वेष साधुः । )
शकारः—( अपवार्य सभयम् ) अविदमादिके अविदमादिके ! । कथं थावलके चेड़े सुट्ठु ण मए शञ्जदे । एशे क्खु मम अकज्जश्श शक्खी । ( विचिन्त्य ) एव्वं दाव कलइश्श । ( प्रकाशम् ) अलिअं भट्टालका ! हंहो ! एशे चेड़े शुवण्णचोलिआए मए गहिदे, पिट्टिदे, मालिदे बद्धे अ । ता किदवेत्रे एशे जं भणादि, किं शच्चं ! ( अपवारितकेन चेटस्य कटकं प्रयच्छति । स्वैरकम् ) पुत्तका ! थावलका ! चेड़ा ! एदं गेण्हिअ अण्णधा भणाहि । ( हन्त ! कथं स्थावरकश्चेटः सुष्ठु न मया संयतः । एष खलु मम अकार्यस्य साक्षी । एवं तावत् करिष्यामि । अलीकं भट्टारकाः ! अहो ! एष चेटः सुवर्णचोरिकया मया गृहीतः, पीडितः, मारितः, बद्धश्च । तत् कृतवैर एष यद्भणति किं सत्यम् ? ) ( पुत्रक ! स्थावरक ! चेट ! एतद् गृहीत्वा अन्यथा भण । )
चेटः—( गृहीत्वा ) पेक्खध पेक्खध भट्टालका ! हंहो ! शुवण्णेण मं पलोभेदि । ( प्रेक्षध्वं प्रेक्षध्वं भट्टारकाः ! । आश्चर्यं, सुवर्णेन मां प्रलोभयति । )
शकार—रतनों के घट के समान मैं स्त्री को नहीं मारता हूँ ।
सभी—तुम्हीं ने ( वसन्तसेना ) मारी है, न कि आर्यचारुदत्त ने ।
शकार—कौन ऐसा कहता है ?
सभी लोग—( चेट को लक्षित करके ) यह सज्जन ( कह रहा है ) ।
शकार—( अपवारित, भयपूर्वक ) हाय ! मैंने स्थावरक चेट को अच्छी तरह क्यों नहीं बांधा था ? यह मेरे कुकृत्य ( वसन्तसेना की हत्या ) का साक्षी है । ( सोच कर ) तो, ऐसा करता हूँ । ( प्रकटरूप में ) महानुभावो ! यह झूठ ( बोलता है ) । इस चेट को सोने की चोरी के कारण मैंने पकड़ा, पीटा, मारा और बांध दिया था । तो दुश्मनी मानने वाला ही यह जो कह रहा है क्या वह सच है ? ( छिपा कर चेट को कंगन देता हुआ धीमी आवाज में ) बेटा स्थावरक चेट ! इस ( कंगन ) को लेकर दूसरी तरह ( झूठ ) बोल दो ।
चेट—( लेकर ) महानुभावो ! देखिये, देखिये । हाय, हाय ! सोने से मुझे लुभा रहा है । [ झूठ बोलने के लिये कह रहा है । ]