मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६०४ | मृच्छकटिकम्
शकारः- ( कटकमाच्छिद्य ) एशे शे शुवण्णके जश्श कालणादो मए वड्ढे । ( सक्रोधम् ) हंहो चाण्डाला ! मए क्ख एशे शुवण्णभण्डाले णिउत्तो, शुवण्णं चोलअन्ते मालिदे, पिट्ठिदे, ता जदि ण पत्तिआअध, ता पिट्ठिं दाव पेक्खध । ( एतत् तत् सुवर्णं यस्य कारणात् मया बद्धः । रे रे चाण्डालौ ! मया खल्वेष सुवर्णभाण्डागारे नियुक्तः सुवर्णं चोरयन् मारितः पीडितः । तद् यदि न प्रत्ययध्वे, तदा पृष्ठं तावत् प्रेक्षध्वम् । )
चाण्डालौ- ( दृष्ट्वा ) शोहणं भणादि । वितत्ते चेडे किं ण प्पलवदि ? ( शोभनं भणति । वितप्तश्चेटः किं न प्रलपति ? )
चेटः- हीमादिके ! ईदृशे दाशभावे, जं शच्चं कं पि ण पत्तिआआदि । ( सकरुणम् ) अज्जचालुदत्त ! एत्तिके मे विहवे । ( हन्त ! ईदृशो दासभावः यत् सत्यं कमपि न प्रत्याययति ।) (आर्यचारुदत्त ! एतावान् मे विभवः ।) ( इति पादयोः पतति । )
चारुदत्तः- ( सकरुणम् )
उत्तिष्ठ भोः ! पतित-साधुजनानुकम्पिन्,
निष्कारणोपगतबान्धव ! धर्मशील ! ।
यत्नः कृतोऽपि सुमहान् मम मोक्षणाय
दैवं न संवदति किं न कृतं त्वयाऽद्य ॥ ३१ ॥
शकार- ( कड़ा छीन कर ) यह वही सोना है, जिसके कारण मैंने बांधा था । (क्रोधसहित) अरे चण्डालो ! मेरे द्वारा सुवर्णभण्डार (खजाने) में नियुक्त किया गया यह सोना चुराते हुये मारा गया, पीटा गया । यदि विश्वास न हो तो इसकी पीठ देख लो ।
दोनों चाण्डाल- ( देखकर ) ठीक कहता है । मार खाने से व्याकुल चेट क्या झूठ नहीं बोल सकता ? अर्थात् झूठ बोलता है ।
चेट- हाय ! नौकर होना इतना खराब है कि सच कहना भी किसी को विश्वास नहीं करा पाता । ( करुणासहित ) आर्य चारुदत्त ! ( आपकी रक्षा करने की ) मेरी इतनी ही शक्ति थी । (यह कहकर चारुदत्त के पैरों पर गिर पड़ता है ।)
अन्वयः- भोः ! पतितसाधुजनानुकम्पिन् !, निष्कारणोपगतबान्धव !, धर्मशील !, उत्तिष्ठ, मम, मोक्षणाय, ( त्वया ), सुमहान्, यत्नः, कृतः, अपि, दैवम्, न, संवदति, अद्य, त्वया, किम्, न, कृतम् ॥ ३१ ॥
शब्दार्थ- भोः=हे !, पतितसाधुजनानुकम्पिन्=कष्ट में फंसे हुये सज्जनों पर कृपा करने वाले, निष्कारणोपगतबान्धव !=बिना किसी कारण के आये हुये