मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽङ्कः ६०७
विदूषकः— भो वअस्स ! एठ्ठवं तुए जाणिदं, तुए विणा अहं पाणाई धारेमि त्ति ? (भो वयस्य ! एवं त्वया ज्ञातम्, त्वया विना अहं प्राणान् धारयामीति ?)
चारुदत्तः— वयस्य ! स्वाधीनजीवितस्य न युज्यते तव प्राणपरित्यागः ।
विदूषकः— (स्वगतम्) जुत्तं ण्णेदं तथावि ण सक्कुणोमि पिअवअस्सविरहिदो पाणाई धारेदुं त्ति । ता वम्हणीए दारअं समप्पिअ पाणपरिच्चाएण अत्तणो पिअवअस्सं अणुगमिस्सं । (प्रकाशम्) भो वअस्स ! पराणेमि एदं लहुं । (युक्तं न्विदम् । तथापि न शक्नोमि प्रियवयस्यविरहितः प्राणान् धारयितुमिति । तत् ब्राह्मण्याै दारकं समर्प्य प्राणपरित्यागेनात्मनः प्रियवयस्यमनुगमिष्यामि ।) (भो वयस्य ! परानयामि एनं लघु ।) (इति सकण्ठग्रहं पादयोः पतति ।)
(दारकोपि रुदन् पतति ।)
शकारः— अले ! णं भणामि शपुत्तकं चालुदत्तकं वावादेध त्ति । (अरे ! ननु भणामि सपुत्रकं चारुदत्तकं व्यापादयतमिति ।)
(चारुदत्तो भयं नाटयति ।)
चाण्डालौ— णहि अम्हाणं ईंदिशी लाआणत्तो, जधा शपुत्तं चालुदत्तं वावादेध त्ति । ता णिक्कम ले दालआ ! णिक्कम (इति निष्क्रामयतः ।)
अर्थ— विदूषक— हे मित्र ! क्या तुमने ऐसा समझ लिया कि मैं तुम्हारे बिना प्राणों को धारण रख सकता हूँ ? अर्थात् नहीं ।
चारुदत्त— जिसका जीवन अपने हाथ (वश) में है ऐसे तुम्हारा प्राण त्यागना ठीक नहीं है ।
विदूषक— (अपने आप में) यद्यपि यह ठीक नहीं है फिर भी प्यारे मित्र के बिना मैं प्राणों को नहीं धारण रख सकता। इस लिये ब्राह्मणी (धूता) को (गोद में) बालक को देकर अपने प्राण छोड़ कर अपने मित्र का अनुगमन करूँगा । (प्रकट में) हे मित्र ! मैं इसे शीघ्र ही वापस कराता हूँ । (घर लौटा देता हूँ ।) (ऐसा कह कर गले में लिपट कर पैरों पर गिर पड़ता है ।) (बालक भी रोता हुआ पैरों पर गिरता है ।)
शकार— अरे ! मैं कह रहा हूँ कि पुत्र के साथ ही इस चारुदत्त को मार डालो ।
(चारुदत्त भय का अभिनय करता है ।)
दोनों चाण्डाल— हम लोगों को राजा की ऐसी आज्ञा नहीं है कि पुत्रसहित