भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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६०८ मृच्छकटिकम्

इमं तइअ घोसणट्ठाणं। ताडेध डिण्डिमं। नहि अस्माकमीदृशी राजाज्ञप्तिः, यथा सपुत्रं चारुदत्तं व्यापादयतमिति। तत् निष्क्रम रे दारक! निष्क्रम।) (इदं तृतीयं घोषणास्थानम्, ताडयत डिण्डिमम्।) (पुनर्घोषयतः।)

शकारः- (स्वगतम्) कथं एशेण पत्तिआअन्ति पौला। (प्रकाशम्) हंहो चालुदत्ता! वडुका! ण पत्तिआअदि एश पौलजणे। ता अत्तणके-लिकाए जीहाए भणाहि 'मए वशन्तशेणा मालिदे' त्ति। (कथमेते न प्रत्ययन्ते पौराः। अरे चारुदत्त वटुक! न प्रत्ययते एष पौरजनः, तदात्मीयया जिह्वया भण--'मया वसन्तसेना मारिता' इति।)

(चारुदत्तः तूष्णीमास्ते।)

शकारः- अले चाण्डालगोहे! ण भणादि चालुदत्तवडुके; ता भणा-वेध इमिणा जज्जल-वंशखण्डेण शङ्कलेण तालिअ तालिअ। (अरे चाण्डाल गोह! न भणति चारुदत्तवटुकः। तद् भणयत अनेन जर्जरवंशखण्डेन शृङ्खलेन ताडयित्वा ताडयित्वा।)

चाण्डालः- (प्रहारमुद्यम्य) भो चारुदत्त! भणाहि। (भोः चारु-दत्त! भण।)

चारुदत्तः- (सकरुणम्)

प्राप्यैतद्व्यसनमहार्णवप्रपातं न त्रासो न च मनसोऽस्ति मे विषादः। एको मां दहति जनापवादवह्नि- र्वक्तव्यं यदिह मया हता प्रियेति ॥ ३३ ॥


चारुदत्त को मार डालो। अतः ए लड़के! निकल जा, निकल जा। (यह कह कर निकालते हैं।) यह तीसरा घोषणास्थान है, नगाड़ा बजाओ। (फिर घोषणा करते हैं।)

शकार- (अपने में) अरे! नगरवासी इस (घटना) का विश्वास क्यों नहीं करते हैं? (प्रकटरूप में) अरे चारुदत्त! ब्राह्मण! ये पुरवासी विश्वास नहीं कर रहे हैं, अतः अपनी जीभ से कहो--"मैंने वसन्तसेना को मार डाला है।"

(चारुदत्त चुपचाप खड़ा रहता है।)

शकार- अरे चाण्डाल गोह! यह ब्राह्मण चारुदत्त [मेरी बात] नहीं कह रहा है। इस लिये इसको नगाड़े बजाने वाले फटे बांस के टुकड़े से पीट कर कहलाओ।

चाण्डाल- (डण्डा उठाकर) हे चारुदत्त! कहो।

अन्वयः- एतद्व्यसनमहार्णवम्, प्राप्य, अपि, मे, मनसः, न, त्रासः, न च,