मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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**प्रथमः—**अले ! तव अत्त वज्झवालिआ । ( अरे ! तवात्र वध्यपालिका । )
**द्वितीयः—**अले ! तव । ( अरे ! तव । )
**प्रथमः—**अले ! लेखअं कलेम्ह । ( इति बहुविधं लेखकं कृत्वा ) अले ! जदि ममकेलिआ वज्झपालिआ, ता चिट्ठदु दाव मुहुत्तअं । ( अरे ! लेखकं कुर्मः । ) ( अरे ! यदि मदीया वध्यपालिका, तदा तिष्ठतु तावन्मुहूर्त्तकम् । )
**द्वितीयः—**किं णिमित्तं ? ( किं निमित्तम् ? )
**प्रथमः—**अले ! भणिदोम्हि पिदुणा शग्गं गच्छन्तेण जधा ‘पुत्त वीरअ ! जइ तुह वज्झवालिआ होदि, मा शहशा वावादअशि वज्झं । ( अरे ! भणितोऽस्मि पित्रा स्वर्गं गच्छता यथा ‘पुत्र वीरक ! यदि तव वध्यपाली भवति, मा सहसा व्यापादयसि वध्यम् । )
**द्वितीयः—**अले ! किं णिमित्तं ? ( अरे ! किं निमित्तम् ? )
**प्रथमः—**कदावि कोवि शाहू अत्थं दइअ वज्झं मोआवेदि । कदावि लण्णो पूत्ते होदि, तेण वद्धावेण शब्बवउज्झाणं मोक्खे होदि । कदावि हत्थी बन्धं खण्डेदि, तेण शम्भमेण वज्झे मुक्के होदि । कदावि लाअपलिवत्ते होदि, तेण शब्बवज्झाणं मोक्खे होदि । ( कदापि कोऽपि साधुरर्थं दत्त्वा वध्यं मोचयति । कदापि राज्ञः पुत्रो भवति, तेन वृद्धिमहोत्सवेन सर्ववध्यानां मोक्षो भवति । कदापि हस्ती बन्धं खण्डयति, तेन सम्भ्रमेण वध्यो मुक्तो भवति । कदापि राजपरिवर्त्तो भवति, तेन सर्ववध्यानां मोक्षो भवति । )
**प्रथम चाण्डाल—**अरे, आज वध करने की तुम्हारी पारी है ।
**दूसरा चाण्डाल—**अरे, तुम्हारी है ।
**प्रथम चाण्डाल—**अरे लिखकर देखते हैं । ( ऐसा कह कर अनेक प्रकार से लिखकर ) अरे, यदि मेरी पारी है तो कुछ देर के लिये रुक जा ।
**दूसरा चाण्डाल—**किस लिये ?
**प्रथम चाण्डाल—**अरे, स्वर्ग जाते समय [ मरते समय ] पिता जी ने यह कहा था—हे बेटा वीरक ! यदि तुम्हारी वध करने की पारी होती है तब अचानक [ शीघ्र ही ] वध्य [ वध्ययोग्य व्यक्ति ] को मत मार डालना ।
**दूसरा चाण्डाल—**अरे, किस लिये ?
**प्रथम चाण्डाल—**कभी कोई सज्जन धन देकर वध्य को छुड़ा ले । कभी राजा का पुत्र हो जाय जिस कारण वृद्धिमहोत्सव से सभी वध्य लोगों की मुक्ति हो जाय । कभी हाथी अपना बन्धन तोड़ दे [ जिस कारण ] घबड़ाहट से वध्य मुक्त हो जाय । कभी राजा का [ परिवर्तन होता है जिससे सभी वध्य लोगों का मोक्ष हो जाता है ।