मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽङ्कः ६११
शकारः—किं किं लाअपलिवत्ते होदि ? ( किं किं राजपरिवर्त्तो भवति ? )
चाण्डालः—अले ! वज्झवालिआए लेक्खअं कलेम्ह ! ( अरे ! बध्यपालिकाया लेखं कुमंः । )
शकारः—अले ! शिग्धं मालेध चालुदत्तं । ( अरे ! शीघ्रं मारयतं चारुदत्तम् । ) ( इत्युक्त्वा चेटं गृहीत्वा एकान्ते स्थितः । )
चाण्डालः—अज्ज चालुदत्त ! लाअणिओओ क्खु अवलज्झदि, ण क्खु अम्हे चाण्डाला । ता सुमलेहि जं सुमलिदव्वं । ( आर्यचारुदत्त ! राजनियोगः खलु अपराध्यति, न खलु वयं चाण्डालाः । तत् स्मर यत् स्मर्त्तव्यम् । )
चारुदत्तः—
प्रभवति यदि धर्मो दूषितस्यापि मेऽद्य प्रबलपुरुषवाक्यैर्भाग्यदोषात् कथञ्चित् । सुरपतिभवनस्था यत्र तत्र स्थिता वा व्यपनयतु कलङ्कं स्वस्वभावेन सैव ॥३४॥
शकार—क्या, क्या राजा का परिवर्तन होता है ?
चाण्डाल—अरे, हम लोग वध करने की पारी का हिसाब लिख रहे हैं ।
शकार—अरे, चारुदत्त को जल्दी ही मार डालो ।
( यह कह कर चेट को लेकर एकान्त में खड़ा हो जाता है । )
चाण्डाल—आर्य चारुदत्त ! राजा का आदेश अपराधी है, न कि हम चाण्डाल लोग, इसलिये जो याद करना चाहते हो याद कर लो ।
अन्वयः—भाग्यदोषात्, अद्य, प्रबलपुरुषवाक्यैः, दूषितस्य, अपि, मे, धर्मः, यदि, कथञ्चित्, प्रभवति, ( तदा ) सुरपतिभवनस्था, यत्र, तत्र, स्थिता, वा, सा, एव, स्वस्वभावेन, कलंकम्, व्यपनयतु ॥३४॥
शब्दार्थ—भाग्यदोषात्=भाग्यदोष के कारण, अद्य=आज, प्रबलपुरुषवाक्यैः=शक्तिशाली पुरुष ( शकार ) के वचनों से, दूषितस्य=दूषित अपराधी, अपि=भी, मे=मेरा, चारुदत्तका, धर्मः=धर्म, सुकृत्यका परिणाम, यदि=अगर, कथञ्चित्=किसी प्रकार, प्रभवति,=प्रभाववाला होता है, ( तदा=तब ) सुरपतिभवनस्था=इन्द्र के भवन में स्थित, वा=अथवा, यत्र तत्र=जहाँ कहीं, स्थिता=स्थित, सा=वह वसन्तसेना, एव=ही, स्वस्वभावेन=अपने निर्दोष स्वभाव से, कलंकम्=[ मेरा ] कलंक मिथ्यापराध, व्यपनयतु=दूर करेगी ॥३४॥
अर्थ—चारुदत्त—
भाग्यदोष के कारण आज शक्तिसम्पन्न पुरुष [ राजा के शाला ] के वाक्यों से दूषित [ अपराधी ] भी मेरा धर्म यदि किसी प्रकार प्रभाववाला होता है तब इन्द्रभवन में विद्यमान अथवा जहाँ कहीं भी रहने वाली वह [ वसन्तसेना ]