मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽङ्कः ६१३
चारुदत्त:—हा ! हतोऽस्मि मन्दभाग्यः । ( इति सावेगमुपविशति । )
शकारः—ण दाव गमिश्शं, चालुदत्ताकं वावादअन्तं दाव पेक्खामि । ( परिक्रम्य दृष्ट्वा ) कथं उपविट्टे ? ( न तावद् गमिष्यामि, चारुदत्तं व्यापायमानं तावत् प्रेक्षे । ) ( कथमुपविष्टः ? )
चाण्डालः—चालुदत्ता ! किं भीदेशि ? ( चारुदत्त ! किं भीतोऽसि ? )
चारुदत्त:—( सहसोत्थाय ) मूर्ख ! ( 'न भीतो मरणादस्मि केवलं दूषितं यशः ।' १०।२७ इत्यादि पुनः पठति । )
चाण्डालः—अज्जवालुदत्त ! गअणदले पडिवशन्ता चन्दशुज्जा वि विपत्तिं लहन्ति, किं उण जणा मरणभीरुआ माणवा वा । लोए को वि उट्ठिदो पडदि, को वि पडिदो उठ्ठदि । ( आर्य चारुदत्त ! गगनतले प्रति-वसन्तौ चन्द्रसूर्यावपि विपत्तिं लभेते; किं पुनर्जना मरणभीरुका मानवा वा । लोके
आधा, अपि=भी, अट्टहासस्य=खूब तेज हँसी के, वेशः=आधार-स्थान, इव=के समान, [दृश्यते=दिखाई पड़ रहा है] ॥५५॥
**अर्थ—**ऊपर उठाये लम्बे शरीरवाले सियार शूल से नीचे लटकने वाले आधे शरीर ( मृतदेह ) को खींच रहे हैं [ खींच कर खा रहे हैं ] शूल में आधा लटकता हुआ शरीर [ मृत देह ] भी अट्टहास के आधार-स्थान के समान [सफेद] दिखाई दे रहा है ॥५५॥
**टीका—**श्मशानस्य भीषणत्वं दर्शयन्नाह—अर्द्धमिति । दीर्घाः=लम्बमानावयवाः उन्नतावयवा वा, ये गोमायवः=शृगालाः, प्रतिवृत्तम्=शूलाद् अधो लम्बमानम्, कलेवरम्=मृतदेहम्, कर्षन्ति=आकृष्य भक्षयन्तीत्यर्थः, शूले लग्नम्=संसक्तम्, अर्द्धम्=अपरभागः, अपि, अट्टहासस्य=अत्युच्चहासस्य, वेशः=आधारस्थानम्, विशति अस्मिन् इत्यधिकरणे घञ्, इव=तुल्यः, आर्या वृत्तम् ॥५५॥
**अर्थ—चारुदत्त—**हाय ! अभागा मैं मारा गया । ( यह कर आवेग के साथ बैठ जाता है ।)
**शकार—**अभी नहीं जाऊँगा । मारे जाते हुये चारुदत्त को देखूँगा । ( घूम कर देखकर ) क्या [ चारुदत्त ] बैठ गया ?
**चाण्डाल—**चारुदत्त ! क्या डर गये हो ?
चारुदत्त—( अचानक उठकर ) मूर्ख ! ( "मैं मृत्यु से नहीं डरता हूँ केवल यश दूषित हुआ है ।" इत्यादि १०/२७ वां श्लोक फिर पढ़ता है ।)
**चाण्डाल—**आर्य चारुदत्त ! आकाश में रहने वाले सूर्य और चन्द्रमा भी विपत्ति प्राप्त करते हैं फिर मृत्यु से डरने वाले मनुष्यों की क्या बात है ? संसार