मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
दशमोऽङ्कः ६१३
चारुदत्त:—हा ! हतोऽस्मि मन्दभाग्यः । ( इति सावेगमुपविशति । )
शकारः—ण दाव गमिश्शं, चालुदत्ताकं वावादअन्तं दाव पेक्खामि । ( परिक्रम्य दृष्ट्वा ) कथं उपविट्टे ? ( न तावद् गमिष्यामि, चारुदत्तं व्यापायमानं तावत् प्रेक्षे । ) ( कथमुपविष्टः ? )
चाण्डालः—चालुदत्ता ! किं भीदेशि ? ( चारुदत्त ! किं भीतोऽसि ? )
चारुदत्त:—( सहसोत्थाय ) मूर्ख ! ( 'न भीतो मरणादस्मि केवलं दूषितं यशः ।' १०।२७ इत्यादि पुनः पठति । )
चाण्डालः—अज्जवालुदत्त ! गअणदले पडिवशन्ता चन्दशुज्जा वि विपत्तिं लहन्ति, किं उण जणा मरणभीरुआ माणवा वा । लोए को वि उट्ठिदो पडदि, को वि पडिदो उठ्ठदि । ( आर्य चारुदत्त ! गगनतले प्रति-वसन्तौ चन्द्रसूर्यावपि विपत्तिं लभेते; किं पुनर्जना मरणभीरुका मानवा वा । लोके
आधा, अपि=भी, अट्टहासस्य=खूब तेज हँसी के, वेशः=आधार-स्थान, इव=के समान, [दृश्यते=दिखाई पड़ रहा है] ॥५५॥
**अर्थ—**ऊपर उठाये लम्बे शरीरवाले सियार शूल से नीचे लटकने वाले आधे शरीर ( मृतदेह ) को खींच रहे हैं [ खींच कर खा रहे हैं ] शूल में आधा लटकता हुआ शरीर [ मृत देह ] भी अट्टहास के आधार-स्थान के समान [सफेद] दिखाई दे रहा है ॥५५॥
**टीका—**श्मशानस्य भीषणत्वं दर्शयन्नाह—अर्द्धमिति । दीर्घाः=लम्बमानावयवाः उन्नतावयवा वा, ये गोमायवः=शृगालाः, प्रतिवृत्तम्=शूलाद् अधो लम्बमानम्, कलेवरम्=मृतदेहम्, कर्षन्ति=आकृष्य भक्षयन्तीत्यर्थः, शूले लग्नम्=संसक्तम्, अर्द्धम्=अपरभागः, अपि, अट्टहासस्य=अत्युच्चहासस्य, वेशः=आधारस्थानम्, विशति अस्मिन् इत्यधिकरणे घञ्, इव=तुल्यः, आर्या वृत्तम् ॥५५॥
**अर्थ—चारुदत्त—**हाय ! अभागा मैं मारा गया । ( यह कर आवेग के साथ बैठ जाता है ।)
**शकार—**अभी नहीं जाऊँगा । मारे जाते हुये चारुदत्त को देखूँगा । ( घूम कर देखकर ) क्या [ चारुदत्त ] बैठ गया ?
**चाण्डाल—**चारुदत्त ! क्या डर गये हो ?
चारुदत्त—( अचानक उठकर ) मूर्ख ! ( "मैं मृत्यु से नहीं डरता हूँ केवल यश दूषित हुआ है ।" इत्यादि १०/२७ वां श्लोक फिर पढ़ता है ।)
**चाण्डाल—**आर्य चारुदत्त ! आकाश में रहने वाले सूर्य और चन्द्रमा भी विपत्ति प्राप्त करते हैं फिर मृत्यु से डरने वाले मनुष्यों की क्या बात है ? संसार
६१४ | मृच्छकटिकम्
कोऽपि उत्थितः पतति, कोऽपि पतित उत्तिष्ठति । )
उट्ठन्तपडन्ताह वशणपाड़िआ शवश्श उण अत्थि ।
एदाईं हिअए कडुअ सन्धालेहि अत्ताणं ॥ ३६ ॥
( उत्तिष्ठत्पततो वसनपातिका शवस्य पुनरस्ति ।
एतानि हृदये कृत्वा सन्धारयात्मानम् ॥ ३६ ॥ )
में कोई उठा हुआ गिरता है कोई गिरा हुआ उठता है ।
अन्वयः—उत्तिष्ठत्पततः, शवस्य, पुनः, वसनपातिका, अस्ति, -एतानि, हृदये, कृत्वा, आत्मानम्, सन्धारय ॥३६॥
शब्दार्थ—उत्तिष्ठत्पततः=कभी ऊपर उठने वाले कभी नीचे जाने वाले, शवस्य=मृत देह, लाश की, पुनः=फिर, वसनपातिका=वस्त्र के समान पतन-क्रिया, अस्ति=होती है [ अथवा जीवन और मृत्यु होती है । ] एतानि=ये बातें, हृदये=हृदय में, निधाय=रखकर, आत्मानम्=अपने को, सन्धारय=सन्तुलित रखो, ढांढ़स दो ॥३६॥
अर्थ—कभी ऊपर जाने वाले और कभी नीचे जाने वाले मृतदेह की फिर से वस्त्र के समान क्रिया होती है अथवा जीवन-मरण होते हैं। इन बातों को हृदय में सोच कर अपने को ढाढ़स दो, धैर्य धारण करो ॥३६॥
टीका—जीवनमरणचक्रं सर्वदैव चलतीति ज्ञात्वा मृत्योर्न भेतव्यमिति चारुदत्त सान्त्वयितुमाह—उत्तिष्ठदिति । उत्तिष्ठत्पततः=कदाचित् उद्गच्छतः कदाचिच्च अधो गच्छतः, शवस्य=मृतदेहस्य, अपि, पुनः वसनपातिका वसनम्=अवस्थानम्, जीवनमित्यर्थः, पातिका=पतनम्, यद्वा वसनस्य=वस्त्रस्य इव पातक्रिया=परित्यागः, 'वासांसि जीर्णानि विहाय देही' इत्यादि-गीतोक्तवचनमनुसृत्येदं बोध्यम्, यद्वा पताकादौ वस्त्रं कदाचित् ऊर्ध्वं प्रयाति कदाचिच्चाधः, तद्वदेव जीवनमपि भवतीति भावः । एतानि=पूर्वोक्तानि तथ्यानि, हृदये=चित्ते, कृत्वा=विचार्य, आत्मानम्=स्वम्, सन्धारय=संस्थापय ! मृत्युभयं परित्यज्य यथानिर्दिष्टं परिपालयेति बोध्यम् । आर्या वृत्तम् ॥ ३६ ॥
विमर्शः—उत्तिष्ठत्पततः—इसके साधुत्व की उपपत्ति के सम्बन्ध में तत्त्वबोधिनी व्याख्याकार का कथन द्रष्टव्य है—
"उत्तिष्ठांश्च पतंश्चेति तयोः समाहारे एकत्वे क्लीबत्वे च प्राप्ते, 'उत्तिष्ठत्पतत्' इति क्लीबैकवचनान्तं पदं सिद्धम् । ततश्च 'द्वन्द्वश्च प्राणितूर्य' ति प्रकरणबहिर्भूतानामपि समाहारद्वन्द्वो भवत्येव, तेन सर्वो द्वन्द्वो विभाषैकवद् भवतीति ।"
वसनपातिका—वसनम्=अवस्थान=जीवन और पतन । पत् धातु से भाव
दशमोऽङ्कः ६१५
( द्वितीयचाण्डालं प्रति ) एदं चउट्ठं घोषणट्ठाणं। ता उग्घोसम्ह। ( एतत् चतुर्थं घोषणास्थानम्। तदुद्घोषयावः। )
( पुनस्तथैव उद्घोषयतः। )
चारुदत्तः – हा प्रिये वसन्तसेने ! ( 'शशिविमलमयूख' इत्यादि १०।१३ पुनः पठति। )
( ततः प्रविशति ससम्भ्रमा वसन्तसेना भिक्षुश्च। )
भिक्षुः – हीमाणहे ! अट्ठाणपरिश्रन्तं शमश्शाशिअ वशन्तशेणिअं णअन्ते अणुग्गहिदम्हि पव्वज्जाए। उवाशिके ! कहिं तुमं णइश्शं ? ( हन्त ! अस्थानपरिश्रान्तां समाश्वास्य वसन्तसेनां नयन् अनुगृहीतोऽस्मि प्रव्रज्यया। उपासिके ! कुत्र त्वां नेष्यामि ? )
वसन्तसेना – अज्जचारुदत्तस्त उज्जेव गेहं। तस्स दंसणेण मिअलंछणस्स विअ कुमुदिणिं आणंदेहि मं। ( आर्यचारुदत्तस्यैव गेहम्। तस्य दर्शनेन मृगलाञ्छनस्येव कुमुदिनीमानन्दय माम्। )
भिक्षुः – ( स्वगतम् ) कदलेण मग्गेण पविशामि ? ( विचिन्त्य )
अर्थ में घञ् करके 'पात' बनाकर पुनः स्वार्थ में 'क' प्रत्यय और टाप् प्रत्यय आदि जोड़कर बनता है।
वसनस्येव पातिका – पताकादि के वस्त्र के समान पतनक्रिया। जैसे पताका का कपड़ा ऊपर और नीचे उड़ता रहता है वैसे ही जीवन-मृत्यु का चक्र चलता रहता है ।। ३६ ।।
अर्थ – ( दूसरे चाण्डाल से ) यह चौथा घोषणा-स्थान है। अतः अब घोषणा करें।
( फिर उसी प्रकार घोषणा करते हैं। )
चारुदत्त – हाय प्रिये वसन्तसेने ! ( "चन्द्रमा की उज्ज्वल किरणों के समान दांतोंवाली !" इत्यादि १०।१३ पद्य को फिर पढ़ता है। )
( इसके बाद घबड़ाई हुई वसन्तसेना और भिक्षु प्रवेश करते हैं। )
भिक्षु – अनुचितरूप से [ या अनुचित स्थान में ] थकी हुयी वसन्तसेना को समाश्वस्त करके ले जाते हुये मैं इस संन्यास द्वारा अनुगृहीत हुआ हूँ। उपासिके ! तुम्हें कहाँ ले चलूँ ?
वसन्तसेना – आर्य चारुदत्त के ही घर [ ले चलो ], उन्हीं के दर्शन से, चन्द्रमा के दर्शन से कुमुदिनी के समान, मुझे आनन्दित करो।
भिक्षु – ( अपने आप में ) किस रास्ते से प्रवेश करू, चलूँ ? ( सोच कर )
६१६ | मृच्छकटिकम्
लाअमग्गेण उज्जेव पविशामि । उवाशिके ! एहि, इमं लाअमग्गं; (आकर्ण्य) किं णु हु एशे लाअमग्गे महंते कलअले शुणोअदि ? ( कतरेण मार्गेण प्रविशामि ? राजमार्गेणैव प्रविशामि । उपासिके ! एहि, अयं राजमार्गः । ) ( किं नु खल्वेष राजमार्गे महान् कलकलः श्रूयते ? )
वसन्तसेना - ( अग्रतो निरूप्य ) कधं पुरदो महाजणसमूहो ? अज्ज ! जाणादि दाव किं ण्णेदं त्ति । विसमभरक्कंता विअ वसुन्धरा एअवासोष्णदा उज्जइणी वट्टदि । ( कथं पुरतो महाजनसमूहः ? आर्य ! जानीहि तावत्किन्निदमिति । विषमभराक्रान्तेव वसुन्धरा एकवासोन्नतोज्जयिनी वर्तते । )
चाण्डालः - इमं अ पच्छिमं घोषणट्ठाणं, ता तालेध डिंडिमं उग्घोशेध घोशणं । (तथा कृत्वा) भो चारुदत्त ! पडिवालेहि । मा भाआहि, लहुं ज्जेव मालीअशि ! ( इदं च पश्चिमं घोषणास्थानम्, तत्ताडयतं डिण्डिमम् । उद्घोषयतं घोषणाम् । ) ( भोश्चारुदत्त ! प्रतिपालय । मा भैषीः, शीघ्रमेव मार्यसे ! )
चारुदत्तः -भगवत्यो देवताः ! ।
भिक्षुः -( श्रुत्वा, ससंभ्रमम् ) उवासिके ! तुमं किल चारुदत्तेण मालिदाशि त्ति चारुदत्तो मालिदुं णीअदि । ( उपासिके ! त्वं किल चारुदत्तेन मारितासीति चारुदत्तो मारयितुं नीयते । )
वसन्तसेना--(ससंभ्रमम्) हद्धी हद्धी, कधं मम मंदभाइणीए किदे अज्ज-चारुदत्तो वावादीअदि ? भो ! तुरिदं तुरिदं आदेसेहि मग्गं । ( हा धिक्
राजमार्ग से ही चलता हूँ । उपासिका जी ! आइये, यह राजमार्ग है । ( सुनकर ) राजमार्ग पर महान् कलकलध्वनि क्यों सुनाई पड़रही है ?
वसन्तसेना-- ( आगे देख कर ) आगे लोगों की भारी भीड़ किस लिये है ? आर्य ! जानते हो यह क्या है ? एक ओर बोझ से दबी हुई पृथिवी के समान उज्जयिनी नगरी एक स्थान पर एकत्रित [ उमड़ी हुई ] हो रही है ।
चाण्डाल--यह अन्तिम घोषणास्थान है, अतः नगाड़ा पीटो, घोषणा घोषित करो, ( नगाड़ा पीट कर घोषणा कर के ) हे चारुदत्त ! प्रतीक्षा करो । मत डरो, जल्दी ही मार डाले जाओगे ।
चारुदत्त--भगवती देवियों ! ।
भिक्षु--( सुन कर घबड़ाहट के साथ ) उपासिके ! 'तुम्हें चारुदत्त ने मारा है', अतः चारुदत्त को ( वध के स्थान पर ) मारने के लिये ले जाया जा रहा है ।
वसन्तसेना--( घबड़ाहट के साथ ) हाय मुझे धिक्कार है, धिक्कार है । मुझ
दशमोऽङ्कः ६१७
-हा धिक्, कथं मम मन्दभागिन्याः कृते आर्य-चारुदत्तो व्यापाद्यते ? भोः ! त्वरितं त्वरितमादिश मार्गम् । )
भिक्षुः—तुवलदु तुवलदु बुद्धोवाशिआ अज्जचालुदत्तं जीअंतं शम-इश्शाशिदुं । अज्जा ! अंतलं अंतलं देध । ( त्वरतां त्वरतां बुद्धोपासिकार्य-चारुदत्तं जीवन्तं समाश्वासयितुम् । आर्याः ! अन्तरमन्तरं दत्त । )
वसन्तसेना—अंतलं अंतलं । ( अन्तरमन्तरम् । )
चाण्डालः—अज्जचालुदत्त ! शामिणिओओ अवलज्झादि । ता शुम-लेहि जं शुमलिदव्वं । ( आर्यचारुदत्त ! स्वामिनियोगोऽपराध्यति । तत्स्मर यत्स्मर्तव्यम् । )
चारुदत्तः—किं बहुना । ( 'प्रभवति-' इत्यादि १०।३४ श्लोकं पठति । )
चाण्डालः—( खडगमाकृष्य ) अज्जचालुदत्ते ! उत्ताणे भविअ समं चिट्ठ । एक्कप्पहालेण मालिअ तुमं शग्गं णेम्ह । ( आर्यचारुदत्त ! उत्तानो भूत्वा समं तिष्ठ । एकप्रहारेण मारयित्वा त्वां स्वर्गं नयावः । )
( चारुदत्तस्तथा तिष्ठति । )
चाण्डालः—(प्रहर्तुमीहते, खड्गपतनं हस्तादभिनयन्) ही, कथं (ही, कथम्)
आअटिढदे शलोशं मृट्ठीए मुट्टिणा गहीदे वि ।
धलणीए कीश पडिदे दालणके अशणिशणिण्हे खग्गे ॥ ३७ ॥
अभागिनी के कारण आर्य चारुदत्त का वध किया जा रहा है । अरे सज्जनों ! जल्दी जल्दी रास्ता बताइये ।
भिक्षु—बुद्धोपासिका ! आर्य चारुदत्त को जीवितरूप में समाश्वस्त करने के लिये जल्दी कीजिये, जल्दी कीजिये । सज्जनों ! रास्ता दीजिये, रास्ता दीजिये ।
वसन्तसेना—रास्ता रास्ता ( दीजिये ) ।
चाण्डाल—आर्य चारुदत्त ! राजा की आज्ञा अपराधी है । अतः जिसको याद करना है याद कर डालो ।
चारुदत्त—अधिक क्या ? ( "यदि किसी प्रकार मेरा धर्म प्रभाववाला हो जाता है"—इत्यादि १०।३४ पद्य को पढ़ता है । )
चाण्डाल—( तलवार खींच कर ) आर्य चारुदत्त ! ऊपर की ओर होकर सीधे खड़े हो जाओ । एक ही प्रहार से मार कर तुम्हें स्वर्ग ले जाते हैं ।
( चारुदत्त उसी प्रकार खड़ा हो जाता है । )
अन्वयः—मुष्टौ, मुष्टिना, गृहीतः, अपि, सरोषम्, आकृष्टः, अशनिसन्निभः, दारुणः, खड्गः, धरण्याम्, किमर्थम्, पतितः ॥ ३७ ॥
६१८ | मृच्छकटिकम्
( आकृष्टः सरोष मुष्टौ मुष्टिना गृहीतोऽपि। धरण्यां किमर्थं पतितो दारुणकोऽशनिसन्निभः खड्गः ॥ ३७ ॥ )
जधा एवं संवृत्तं, तथा तक्केमि ण विवज्जदि अज्जचालुदत्ते त्ति । भअवदि शज्झवाशिणि ! पशीद पशीद ! अबि णाम चालुदत्तश्श मोक्खे भवे, तदो अणुगहीदं तुए चाण्डालउलं भवे ।
( यथैतत्संवृत्तम्, तथा तर्कयामि न विपद्यत आर्यचारुदत्त इति । भगवति सह्यवासिनि ! प्रसीद प्रसीद । अपि नाम चारुदत्तस्य मोक्षो भवेत्, तदानुगृहीतं त्वया चाण्डालकुलं भवेत् । )
**अपरः—**जधाण्णतं अणुचिट्ठम्ह । ( यथाज्ञप्तमनुतिष्ठावः । )
**शब्दार्थ—**मुष्टौ=मूठ पर, मुष्टिना=मुट्ठी से, गृहीतः=[ कस कर ] पकड़ी गयी, अपि=भी, सरॊषम्=क्रोधपूर्वक खींची गयी, अशनिसन्निभः=वज्र के समान, दारुणः=भयंकर, खड्गः=तलवार, धरण्याम्=जमीन में, किमर्थम्=किस लिये, पतितः=गिर गयी ? ॥ ३७ ॥
अर्थ—चाण्डाल—( प्रहार करना चाहता है, हाथ से तलवार गिरने का अभिनय करता हुआ )
मूठ में मुट्ठी से [ अच्छी तरह ] पकड़ी गयी, क्रोध से खींची गयी, वज्र के तुल्य भयंकर तलवार जमीन पर किसलिये गिर गयी ? ॥ ३७ ॥
**टीका—**हस्तात् खड्गपतनं विलोक्य वध्यस्य शुभं विचार्य प्रसन्नतामनुभवन् आश्चर्यं व्यनक्ति — आकृष्ट इति । मुष्टौ=खड्गमुष्टौ, मूलदेशे इति भावः, मुष्टिना=चाण्डालस्य बद्धहस्तेन, गृहीतः=धृतः, अपि, अशनिसन्निभः=वज्रतुल्यः, दारुणः=भयंकरः, खड्गः=असिः, धरण्याम्=पृथिव्याम्, किमर्थम्=केन कारणेन, पतितः=निपतितः, सावधानतया धृतोऽपि खड्गो मम हस्ताद् भूमो निपतित इति महदाश्चर्यकरमिति भावः । एतेन चारुदत्तस्य वधो न भविष्यतीति सूचितम् । गीतिवृत्तम् ॥३७॥
**अर्थ—**जिस प्रकार यह हो गया है उससे यह सोचता हूँ कि आर्य चारुदत्त नहीं मरेगा । भगवती सह्यवासिनी ! प्रसन्न हो जाओ, प्रसन्न हो जाओ । यदि चारुदत्त की मुक्ति हो जाय [ मृत्यु दण्ड न दिया जाय ] तब तुम चाण्डालकुल को अनुगृहीत करोगी ।
**दूसरा चाण्डाल—**हम दोनों राजा की आज्ञा का पालन करें ।
दशमोऽङ्कः ६१६
**प्रथमः--**भोदु, एवं कलेम्ह । ( भवतु, एवं कुर्वः । )
( इत्युभौ चारुदत्तं शूले समारोपयितुमिच्छतः । )
( चारुदत्तः 'प्रभवति-' १०।३४ इत्यादि पुनः पठति । )
भिक्षुर्वसन्तसेना च--( दृष्ट्वा ) अज्जा ! मा दाव मा दाव । अज्जा ! एसा अहं मंदभाइणी, जाए कारणादो एसो वावादीअदि । ( आर्याः ! मा तावन्मा तावत् । आर्याः ! एषाहं मन्दभागिनी यस्याः कारणादेष व्यापाद्यते । )
चाण्डालः--( दृष्ट्वा )
का उण तुलिंदं एशा अंशपडंतेण चिउलभालेण ।
मा मेत्ति वाहलंतो उट्ठिदहत्था इदो एदि ॥ ३८ ॥
( का पुनस्त्वरितमेषांसपतता चिकुरभारेण ।
मा मेति व्याहरन्त्युत्थितहस्तेत एति ॥ ३८ ॥ )
**पहला चाण्डाल--**अच्छा, ऐसा ही करते हैं ।
( यह कह कर दोनों चारुदत्त को शूल पर चढ़ाना चाहते हैं । )
( चारुदत्त -“यदि मेरा धर्म प्रभावशाली होता है”--१०/३४ पद्य फिर पढ़ता है । )
भिक्षु और वसन्तसेना ( देखकर ) महानुभावो ! ऐसा मत करो, ऐसा मत करो । महानुभावों ! मैं ही वह अभागिनी हूँ जिसके कारण इनको मारा जा रहा है ।
अन्वयः - अंसपतिता, चिकुरभारेण, उत्थितहस्ता, मा, मा-इति व्याहरन्ती, एषा, का, पुनः, त्वरितम्, इतः, एति ॥३८॥
**शब्दार्थः -**अंसपतिता=कन्धे पर गिरे हुये, चिकुरभारेण=केशकलाप से उपलक्षित, उत्थितहस्ता=उठाये हुये हाँथोंवाली, मा मा इति=ऐसा नहीं, ऐसा नहीं ( करो ) इस प्रकार, व्याहरन्ती=चिल्लाती हुई, एषा=यह, का पुनः=कौन सी स्त्री, त्वरितम्=अति शीघ्र, इतः=इधर, एति=आ रही है ? ॥३८॥
अर्थ--चाण्डाल--( देखकर )
कंधों पर गिरने वाले केशकलाप से युक्त, हाथ ऊपर उठाये हुये 'ऐसा नहीं, ऐसा नहीं' ( करो ) यह कहती हुई कौन सी स्त्री इधर ही जल्दी-जल्दी आ रही है ? ॥३८॥
**टीका--**ससम्भ्रममागच्छन्तीं वसन्तसेनां दृष्ट्वा चाण्डालस्तर्कयति -केति । अंसयोः=स्कन्धयोः, पतता=पतनशीलेन, चिकुरभारेण=शिरस्थकेशकलापेन उपलक्षिता सती, उत्थितौ=उद्गतौ हस्तौ=करौ यस्यास्तादृशी, मा मा=नहि नहि,
६२० मृच्छकटिकम्
वसन्तसेना--अज्जचालुदत्त ! किं ण्णेदं ? (आर्य चारुदत्त ! किं न्विदम् ?)
(इत्युरसि पतति ।)
भिक्षुः--अज्जचालुदत्त ! किं ण्णेदं ? (आर्य चारुदत्त ! किं न्विदम् ?)
(इति पादयोः पतति ।)
चाण्डालः--(सभयमुपसृत्य) कधं वशंतशेणा ? णं खु अम्हेहि शाहु णं वावादिदे । (कथं वसन्तसेना ? ननु खल्वस्माभिः साधुर्न व्यापादितः ।)
भिक्षुः--(उत्थाय) अले, जीवदि चालुदत्ते ? (अरे, जीवति चारुदत्तः ?)
चाण्डालः--जीवदि वश्शशदं । (जीवति वर्षशतम् ।)
वसन्तसेना--(सहर्षम्) पच्चुज्जीविदम्हि । (प्रत्युज्जीवितास्मि ।)
चाण्डालः--ता जाव एदं वृत्तं लाइणो जण्णवाडगदश्श णिवेदेम्ह ।
(तद्यावदेतत् वृत्तं राज्ञो यज्ञवाटगतस्य निवेदयावः ।)
(इति निष्क्रामतः ।)
शकारः--(वसन्तसेनां दृष्ट्वा, सत्रासम्) हीमादिके, केण गब्भदाशी जीवाविदा ? उक्कंताइ मे पाणाईं । भोदु, पलाइश्शं । (आश्चर्यम्, केन गर्भदासी जीवनं प्रापिता ? उत्क्रान्ता मे प्राणाः । भवतु, पलायिष्ये ।)
(इति पलायते ।)
इदं कुर्विति शेषः, इति=इत्थम्, व्याहरन्ती=आलपन्ती, एषा=पुरो दृश्यमाना, का पुनः=का स्त्री, त्वरितम्=अतिशीघ्रम्, इतः=अस्यां दिशि, एति=आगच्छतीत्यर्थः। आर्या वृत्तम् ॥३८॥
**अर्थ--वसन्तसेना--**आर्य चारुदत्त ! यह क्या है ? (ऐसा कहती हुई उसके उरस्थल पर गिर जाती है।)
**भिक्षु--**आर्य चारुदत्त ! यह क्या है ? (यह कह कर पैरों पर गिर जाता है।)
चाण्डाल--(भयसहित पास आकर) क्या वसन्तसेना ? बहुत अच्छा हुआ जो हम लोगों ने इस सज्जन का वध नहीं कर दिया ।
भिक्षु--(उठकर) अरे, चारुदत्त जीवित हैं।
**चाण्डाल--**सौ वर्षों तक जीवित रहें।
वसन्तसेना--(हर्षपूर्वक) मैं पुर्नजीवित हो गयी हूँ।
**चाण्डाल--**तब तो यह वृत्तान्त यज्ञशाला में गये राजा को सूचित कर दें।
(यह कह कर दोनों निकल जाते हैं।)
शकार--(वसन्तसेना को देखकर भयसहित) हाय, किसने यह गर्भदासी जिन्दा कर दी ? मेरे प्राण निकल गये। अच्छा, भाग चलूं।
(यह कह कर भागता है।)
दशमोऽङ्कः ६२५
चाण्डालः-- ( उपसृत्य ) अले, णं अम्हाणं ईंदिशी लाआणत्तो—जेण शा वावादिदा, त मालेध त्ति । ता लट्टिअशालं ज्जेव अण्णेशम्ह ।
( अरे, नन्वावयोरीदृशी राजाज्ञप्तिः — येन सा व्यापादिता, तं मारयतमिति । तद्राष्ट्रियश्यालमेवान्विष्यावः । )
( इति निष्क्रान्तौ । )
चारुदत्तः-- ( सविस्मयम् )
केयमभ्युद्यते शस्त्रे मृत्युवक्त्रगते मयि ।
अनावृष्टिहते सस्ये द्रोणवृष्टिरिवागता ॥ ३६ ॥
( अवलोक्य च )
वसन्तसेना किमियं द्वितीया समागता सैव दिवः किमित्थम् ।
भ्रान्तं मनः पश्यति वा ममैनां वसन्तसेना न मृताऽथ सैव ॥ ४० ॥
चाण्डाल-- ( पास जाकर ) अरे ! हम लोगों को राजा की ऐसी आज्ञा है 'जिसने उस ( वसन्तसेना ) को मारा है, उसे मार डालो।' इस लिये अब राजा के शाल को ही खोजें।
( यह कह कर दोनों निकल जाते हैं । )
अन्वय.-- अनावृष्टिहते, सस्ये, द्रोणवृष्टिः, इव, शस्त्रे, अभ्युद्यते, मृत्युवक्त्रगते, मयि, आगता, इयम्, का ? ॥३६॥
शब्दार्थ-- अनावृष्टिहते=सूखा पड़ने से नष्ट हो रहे, सस्ये=हरे धान्य में, द्रोणवृष्टिः=द्रोणनामक मेघ की वर्षा, इव=के समान, शस्त्रे=शस्त्र [ तलवार आदि ] के, अभ्युद्यते=उठा लिए जाने पर, मृत्युवक्त्रगते=मौत के मुंह में चले गये, मयि=मेरे लिये, आगता=आयी हुई, इयम्=यह स्त्री, का=कौन है ? ॥३६॥
अर्थ-- चारुदत्त-- ( आश्चर्यसहित )
सूखा पड़ने से हरे धान्य के सूखने पर [ अभीष्ट वर्षा करने वाले ] द्रोण नामक मेघ की वर्षा के समान, शस्त्र उठा लिये जाने पर मौत के मुख में मेरे पहुँच जाने पर आयी हुई यह स्त्री कौन है ? ॥ ३९ ॥
टीका-- मृत्युमुखगतमात्मानं रक्षितुं समागतां तां द्रोणवृष्टिमिव चिन्तयन्नाह - केयमिति । अनावृष्ट्या=अवर्षणेन, हते=नश्यमाने, शुष्कप्राये, शस्ये=हरितधान्ये, द्रोणः=सस्यप्रपूरको मेघविशेषः, तस्य वृष्टिः=अपेक्षितवर्षा, इव=यथा, शस्त्रे=वधसाधने=खड्गादौ, अभ्युद्यते=मामभिलक्ष्य उत्थापिते सति, मृत्योः=कालस्य, वक्त्रम्=मुखम्, गते=आपन्ने, मयि=चारुदत्ते, आगता=मम रक्षणार्थं समागता, इयम्=पुरो वर्तमाना स्त्री, का=किन्नामधेया। अत्रोपमालंकारः, पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥३९॥
अन्वयः-- इयम्, वसन्तसेना, किम् (अथवा) द्वितीया, किम्वा, इत्थम्, दिवः,
६२२ मृच्छकटिकम्
अथवा---
किं नु स्वर्गात्पुनः प्राप्ता मम जीवातुकाम्यया । तस्याः रूपानुरूपेण किमुतान्येयमागता ॥ ४१ ॥
समागता ? वा, मम, भ्रान्तम्, मनः, एनाम्, पश्यति, अथ, वसन्तसेना न, मृता, सा, एव, [ इयम् ] ॥ ४० ॥
शब्दार्थ---इयम्=यह सामने खड़ी, वसन्तसेना=वसन्तसेना, है, किम्=क्या ? ( अथवा ) द्वितीया=दूसरी कोई है ? किम्वा=अथवा क्या, इत्थम्=इस प्रकार, दिवः=स्वर्ग से, समागता=आयी है, वा=अथवा, भ्रान्तम्=भ्रम में पड़ा हुआ, मम=मेरा, चारुदत्त का, मनः=मन, एनाम्=इसे वसन्तसेना को, पश्यति=देख रहा है ? अथ=अथवा, वसन्तसेना=वसन्तसेना, न=नहीं, मृता=मरी है, सा=वह, एव=ही, [ इयम्=यह, है । ] ॥४०॥
( और देखकर )
अर्थ--यह क्या वसन्तसेना है, अथवा कोई दूसरी स्त्री है ? क्या वही इस प्रकार [मुझे बचाने के लिये] स्वर्ग से आयी ? अथवा भ्रम में पड़ा हुआ मेरा मन उसे [वसन्तसेना को] देख रहा है ? अथवा वसन्तसेना नहीं मरी है, यह वही है ॥४०॥
टीका--मूर्तिमतीं पुरोवर्तमानां स्त्रियमवलोक्य चारुदत्तस्तद्विषये वितर्कते-वसन्तसेनेति । इयम्=पुरो दृश्यमाना, वसन्तसेना=मम प्रेयसी, किम् ? अथवा, द्वितीया=अपरा, वसन्तसेनाभिन्ना काचन स्त्री ? किम्वा, सैव=मत्प्रेयसी वसन्तसेना एव, इत्थम्=एवं प्रकारेण, मरणानन्तरमपि मम रक्षणार्थमिति भावः, दिवः=स्वर्गात्, समागता=अत्रोपस्थिता किम् ? वा=अथवा, भ्रान्तम्=भ्रमपतितम्, मे=चारुदत्तस्य, मनः=चित्तम्, एनाम्=पुरोवर्तिनीम् स्त्रियम्, वसन्तसेनातः भिन्नामपि तद्रूपेण, पश्यति=अवलोकयति किम् ? अथ=अथवा, वसन्तसेना=मम प्रेयसी वसन्तसेना, न=नैव, मृता, सा=पूर्वानुभूता, एव, इयं स्त्रीति बोध्यम् । एवञ्चैकस्यामेव विविध-सन्देहसत्त्वात् सन्देहालंकारः, स च निश्चयान्त इति । उपजातिवृत्तम् ॥४०॥
अन्वयः--मम, जीवातुकाम्यया, स्वर्गात्, पुनः, प्राप्ता, किम्, नु ? उत, तस्याः, रूपानुरूपेण, इयम्, अन्या, आगता, किम् ? ॥ ४१ ॥
शब्दार्थ--मम=मुझ ( चारुदत्त ) को, जीवातुकाम्यया=जिन्दा कराने की इच्छा से, स्वर्गात्=स्वर्ग से, पुनः=फिर, प्राप्ता=( यहाँ ) आई हुई है, किम् नु=क्या ? अन्या=अथवा, तस्याः=उसके, रूपानुरूपेण=रूप के समान रूप से, इयम्,=यह, अन्या=दूसरी, आगता=आई है, किम्=क्या ? ॥ ४१ ॥
अर्थ--अथवा---
मुझे जिन्दा कराने की इच्छा से यह स्वर्ग से फिर ( वापस ) आ गयी है
दशमोऽङ्कः ६२३
वसन्तसेना-- ( सास्रमुत्थाय, पादयोर्निपत्य ) अज्ज चारुदत्त ! सा उज्जेव्व अहं पावा, जाए कारणादो इअ तुए असरिसी अवस्था पाविदा । ( आर्य-चारुदत्त ! सैवाहं पापा, यस्याः कारणादियं त्वयाऽसदृश्यवस्था प्राप्ता । )
( नेपथ्ये )
अच्छरिअं, अच्छरिअं, जीवदि वसन्तशेणा । ( आश्चर्यमाश्चर्यम्, जीवति वसन्तसेना । ) ( इति सर्वे पठन्ति । )
चारुदत्तः -- (आकर्ण्य सहसोत्थाय स्पर्शसुखमभिनीय निमीलिताक्ष एव हर्षगद्-गदाक्षरम् ) प्रिये ! वसन्तसेना त्वम् ?
वसन्तसेना -- सा उज्जेवाहं मंदभाआ । ( सैवाह मन्दभाग्या । )
चारुदत्तः-- ( निरूप्य सहर्षम् ) कथं वसन्तसेनैव ? ( सानन्दम् )
कुतो बाष्पाम्बुधाराभिः स्नपयन्ती पयोधरौ ।
मयि मृत्युवशं प्राप्ते विद्येव समुपागता ॥ ४२ ॥
क्या ? अथवा उस ( वसन्तसेना ) के रूप के समान रूप से यह कोई दूसरी स्त्री आई है क्या ? ॥ ४१ ॥
टीका-- पूर्वश्लोकोक्तमेवार्थं भङ्ग्यन्तरेण प्रतिपादयति —किमिति । मम=स्वप्रियस्य चारुदत्तस्य, जीवातोः=जीवनस्य, काम्या=इच्छा तया, मम जीवनरक्षणेच्छया, स्वर्गात्=सुरपुरात्, पुनः=द्वितीयवारम्, प्राप्ता=भूमौ समागता, किं नु ? न्विति वितर्के, उत=अथवा, तस्याः=वसन्तसेनायाः, रूपस्य=अवयवसंस्थानस्य, अनुरूपेण साम्येन, तदाकृतितुल्याकृत्येत्यर्थः, इयम्=पुरोवर्त्तमाना, अन्या=वसन्तसेनातः भिन्ना, आगता=समागता, किम् ? अत्र सन्देहालंकारः, पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ ४१ ॥
अर्थ--वसन्तसेना-- ( आंसुओं सहित उठकर चारुदत्त के पैरों पर गिर ) आर्य चारुदत्त ! मैं ही वह अभागिनी हूँ जिसके कारण आपको यह अनुचित दशा [ मृत्युदण्ड ] प्राप्त हुई ।
( नेपथ्य में )
आश्चर्य है, आश्चर्य, वसन्तसेना जीवित है । ( ऐसा सभी लोग बोलते हैं । )
चारुदत्त-- ( सुनकर अचानक उठकर स्पर्श सुख का अभिनय करके आँखें बन्द किये हुये ही हर्ष से गद्गद वाणी में ) प्रिये ! वसन्तसेना तुम ?
**वसन्तसेना--**हाँ, मैं ही वह अभागिनी हूँ ।
**अन्वयः--**मयि, मृत्युवशम्, प्राप्ते, बाष्पाम्बुधाराभिः, पयोधरौ, स्नपयन्ती, [ त्वम् ], विद्या, इव, कुतः समागता ? ॥ ४२ ॥
**शब्दार्थ--**मयि=मेरे, मृत्युवशम्=मौत के वश को, प्राप्ते=पा लेने पर, बाष्पा=
६२४ मृच्छकटिकम्
प्रिये वसन्तसेने !
त्वदर्थमेतद्विनिपात्यमानं देहं त्वयैव प्रतिमोचितं मे।
अहो प्रभावः प्रियसंगमस्य मृतोऽपि को नाम पुनर्ध्रियेत ? ॥ ४३ ॥
म्बुधाराभिः,=आंसुओं की धाराओं से, पयोधरौ=स्तनों को, स्तनपयन्ती=नहलाती हुई, [ त्वम्=तुम ], विद्या=विद्या, इव=के समान, कुतः=कैसे या कहाँ से, समा-गता=आ गयी हो ? ॥ ४२ ॥
अर्थ - चारुदत्त—(देखकर, हर्षसहित) क्या वसन्तसेना ही हो ? (आनन्दपूर्वक) मेरे मौत के मुंह में चले जाने पर आँसुओं की धाराओं से स्तनों को नहलाती हुई तुम [भूली हुई या सञ्जीवनी] विद्या के समान कहाँ से आ गयी हो ? ॥४२॥
टीका—स्वप्रेयसीं वसन्तसेना जीवन्तीं विलोक्य हर्षं प्रकटयन्नाह-कुत इति । मयि=चारुदत्ते इत्यर्थः, मृत्युवशम्=मरणाधीनताम्, गते=प्राप्ते सति, वाष्पाम्बु-धाराभिः=मद्दुःखद्रवितचेतसा विनिः सृताश्रुसमूहैः, पयोधरौ=स्तनौ, स्तनपयन्ती=अभिषिञ्चन्ती, त्वम्, विद्या=मूर्तिमती सञ्जीवनी विद्या, इव=यथा, कुतः=कस्मात् स्थानात्, समागता=इहागता । यथा खलु कस्यचिज्जीवनरक्षणार्थं सञ्जीवनी विद्या एव स्वयमुपस्थिता भूत्वा रक्षां करोति तथैव त्वमपि स्वतः उपस्थिता भूत्वा मम रक्षां करोषीति भावः । यद्वा विस्मृता काचिद् विद्या कदाचित् स्मृति-पथमागत्य कार्यं साधयति तथैव त्वमपि सहसोपसृत्य मम प्राणरक्षणमकार्षीरिति भावः । अत्रोपमालंकारः ॥ ४२ ॥
अन्वयः—त्वदर्थम्, विनिपात्यमानम्, मे, देहम्, त्वया, एव, प्रतिमोचितम्, प्रियसङ्गमस्य, अहो !, प्रभावः, कः, मृतः, नाम, पुनः ध्रियेत ॥ ४३ ॥
शब्दार्थ—त्वदर्थम्=तुम्हारे लिये या तुम्हारे कारण, विनिपात्यमानम्=विनष्ट किया जाता हुआ, मारा जाता हुआ, मे- मेरा, देह=शरीर, त्वया=तुमने, एव=ही प्रतिमोचितम्=बचा लिया, प्रियसङ्गमस्य=प्रियमिलन का, अहो=आश्चर्यजनक, प्रभावः=प्रभाव, फल, है, मृतः=मरा हुआ, अपि=भी, को नाम=कौन, पुनः=फिर, ध्रियेत=जीवित हो सकता है ! ॥ ४३ ॥
अर्थ—प्रिये वसन्तसेने !
तुम्हारे लिये या तुम्हारे कारण नष्ट किया जाता [ मारा जाता ] हुआ मेरा शरीर तुम्हारे द्वारा ही बचा लिया गया, प्रियमिलन का आश्चर्यजनक प्रभाव ही है। अन्यथा मरा हुआ भी कोई पुनः जिन्दा हो सकता है ॥ ४३ ॥
टीका—वसन्तसेना-निमित्ताद् मृत्युदण्डं प्राप्तः, पुनः तयैव प्रकटीभूय
दशमोऽङ्कः । ६२५
अपि च, प्रिये ! पश्य,--
रक्तं तदेव वरवस्त्रमियं च माला
कान्तागमेन हि वरस्य यथा विभाति ।
एते च वध्यपटहध्वनयस्तथैव
जाता विवाहपटहध्वनिभिः समानाः ॥ ४४ ॥
संरक्षित इति प्रियसङ्गमस्य प्रभावं प्रतिपादयति-त्वदर्थेति । त्वदर्थम्=त्वम्=वसन्तसेना एव अर्थः=निमित्तं यस्मिन् तद् यथा, क्रियाविशेषणम्, विनिपात्यमानम्=घातकैः त्वरितमेव विनाश्यमानम्, मे=मम, चारुदत्तस्येत्यर्थः, देहम्=शरीरम्, [ कायदेहौ क्लीबपुंसावित्यमरानुरोधेन देहशब्दस्य क्लीबत्वं समीचीनं बोध्यम् । ] त्वया=वसन्तसेनया, एव, प्रतिमोचितम्=रक्षितम् । तव कारणादेव मृत्युदण्डः निर्दिष्टः, तवोपस्थित्या एव च पुनर्जीवनमिति भावः । प्रियसंगमस्य=प्रियायाः समागमस्य, अहो=आश्चर्यकरः, प्रभावः=माहात्म्यम्, कः=को जनः, नाम=इदं सम्भावनायाम्, मृतः=गतप्राणः सन्नपि, पुनः=भूयः, ध्रियेत=जीवेत इति भावः । साम्प्रतं प्रियायाः संगमेनैव मम प्राणरक्षा कृतेति भावः । उपजातिवृत्तम् ॥४३॥
**अन्वयः—**कान्तागमेन, तदेव, रक्तम्, वरवस्त्रम्, इयम्, माला, च, वरस्य, यथा, हि, विभाति, तथैव, च, एते, वध्यपटहध्वनयः, विवाहपटहध्वनिभिः, समानाः, जाताः ॥ ४४ ॥
**शब्दार्थः—**कान्तागमेन=प्रेयसी वसन्तसेना के आ जाने से, तदेव=वही, रक्तम्=लाल, वरवस्त्रम्=श्रेष्ठ कपड़ा, च=और, इयम्=यह, माला=माला, वरस्य=दूल्हे के, यथा=समान, हि=निश्चितरूप से, विभाति=शोभित हो रही है, च=और, तथैव=उसी प्रकार, वध्यपटहध्वनयः=वध करने के लिये बजाये जाने वाले नगाड़े की आवाजें, विवाहपटहध्वनिभिः=विवाह में बजनेवाले नगाड़ा की आवाज के, समानाः=समान, जाताः=हो गयी हैं ॥४४॥
**अर्थ—**और भी, प्रिये ! देखो —
प्रेयसी के [ तुम्हारे ] आजाने से वही लाल कपड़ा श्रेष्ठ वस्त्र और यह माला ( विवाह के लिये जाते हुये ) दूल्हे के समान शोभित हो रही है। और उसी प्रकार वध के लिये बजने वाले नगाड़ा की आवाजें विवाह में बजने वाले नगाड़े के समान हो गयीं हैं ॥४४॥
**टीका—**परिस्थितिवशात् कदाचिदप्रियं वस्त्वपि प्रियरूपेण परिवर्तते इति प्रतिपादयति-रक्तमिति । कान्तायाः=प्रेयस्याः, आगमेन=उपस्थित्या हेतुनेत्यर्थः, तदेव=इदमेव, रक्तम्=रक्तवर्णम्, वरवस्त्रम्=उत्कृष्टवस्त्रम्, च=तथा, इयम्=मम ग्रीवायां लम्बमाना, माला=माल्यम्, वरस्य=उद्वोढुः यथा=इव, विभाति=शोभते,
४० मृ०
| ६२६ | मृच्छकटिकम् |
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वसन्तसेना--अदिदक्खिणदाए किं ण्णेदं ववसिदं अज्जेण ? ( अतिदाक्षिण्यतया किं न्विदं व्यवसितमार्येण ? )
चारुदत्तः--प्रिये ! ‘त्वं किल मया हतेति’--
पूर्वानुबद्धवैरेण शत्रुणा प्रभवष्णुिना ।
नरके पतता तेन मनागस्मि निपातितः ॥ ४५ ॥
वसन्तसेना--(कर्णौ पिधाय) संतं पावं, तेण म्हि राअसालेण वावादिदा ।
( शान्तं पापम्, तेनास्मि राजश्यालेन व्यापादिता । )
चारुदत्तः ( भिक्षुं दृष्ट्वा ) अयमपि कः ?
च, तथैव=तद्वदेव, एते=श्रूयमाणा इमे, वध्यपटहध्वनयः=वध्यस्य कृते क्रियमाणाः वाद्यविशेषध्वनयः, विवाहपटहध्वनिभिः=उद्वाहादौ वाद्यमानानां पटहानाम्=ढक्कादीनाम्, ध्वनिभिः समाना । पूर्वं ये पदार्थाः कष्टकारिण आसन् त एव साम्प्रतं वसन्तसेनायाः समागमने प्रीतिकराः परिवृत्ता इति भावः । वसन्ततिलकं वृत्तम् ॥४४॥
अर्थ—वसन्तसेना—अति उदारता के कारण आर्य आपने यह क्या कर डाला ?
अन्वयः--पूर्वानुबद्धवैरेण, प्रभवष्णुिना, नरके, पतता, शत्रुणा, मनाक्, निपातितः, अस्मि ॥ ४५ ॥
शब्दार्थ--पूर्वानुबद्धवैरेण=पहले से ही दुश्मनी रख लेने वाले प्रभवष्णुिना=सामर्थ्यशाली, नरके=नरक में, पतता=गिरने वाले, शत्रुणा=शत्रु शकार के द्वारा, मनाक्=थोड़ा, निपातितः=गिरा, कलंकित कर दिया गया, अस्मि=हूँ, था ॥ ४५ ॥
अर्थ—चारुदत्त—प्रिये ! ‘तुम्हें मैंने मार दिया’ --
पहले से ही दुश्मनी रखने वाले [ राजा का शाला होने से ] शक्तिशाली [ किन्तु ] नरक में गिरने वाले उस शत्रु शकार द्वारा कुछ गिरा दिया गया हूँ । [ कलंकित कर दिया गया था । ] ॥ ४५ ॥
टीका--प्राप्तदशायाः हेतुं स्वप्रियायै निवेदयति—पूर्वेति । पूर्वानुबद्धवैरेण=पूर्वतः एव अनुबद्धं=मनसि दृढ़ीकृतं वैरं=शत्रुत्वं येन तादृशेन, प्रभवष्णुिना=राज्ञः श्यालत्वेन सामर्थ्यवता, नरके=निरये, पतता=आत्मानं निक्षिपता, तेन=प्रसिद्धेन दुष्टेन, शकारेणेत्यर्थः, मनाक्=प्रायशः, स्वल्पं वा, निपातितः=विनाशितः, मिथ्यापवादे निक्षिप्तः, अस्मि=भवामि । ‘त्वं मया हृता’ इति मिथ्याभियोगेनाहं कलंकित इति भावः । पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ ४५ ॥
अर्थ—वसन्तसेना--( कान बन्द करके ) ऐसा मत कहिये । उस राजश्यालक शकार ने मारा था ।
चारुदत्त--( भिक्षु को देखकर ) यह कौन है ?
दशमोऽङ्कः ६२७
वसन्तसेना—तेण अणज्जेण वावादिदा, एदिणा अज्जेण जीवाविदम्हि । ( तेनानार्येण व्यापादिता; एतेनार्येण जीवं प्रापितास्मि । )
चारुदत्तः- कस्त्वमकारणबन्धुः ?
भिक्षुः--ण पच्चभिजाणादि मं अज्जो ? अहं शे अज्जश्श चणणशंवाहचिन्तए शंवाहके णाम जूदिअलेहिं गहिदे एदाए उवाशिकाए अज्जश्श केलके त्ति अलंकालपण्णिक्कीदेम्हि । तेण अ जूदणिठवेदेण शक्कशमणके संवुत्ते म्हि । एशा वि अज्जा पवहणविपज्जाशेण पुप्फकलंउकजिण्णुज्ज'णं गदा । तेण अ अणज्जेण ण मं बहु मण्णेशि त्ति बाहु'शबलक्कालेण मालिदा मए दिट्ठा । ( न प्रत्यभिजानाति मामार्यः ? अहं स आर्यस्य चरणसंवाहचिन्तकः संवाहको नाम द्यूतकरैर्गृहीत एतयोपासिकयाऽऽर्यस्यात्मीय इत्यलङ्कारपणनिष्क्रोतोऽस्मि । तेन च द्यूतनिर्वेदेन शाक्यश्रमणकः संवृत्तोऽस्मि । एषाप्यार्या प्रवहणविपर्यासेन पुष्पकरण्डकजीर्णोद्यानं गता । तेन चानार्येण न मां बहु मन्यते इति बाहुपाशबलात्कारेण मारिता मया दृष्टा । )
( नेपथ्ये कलकलः )
जयति वृषभकेतुर्दक्षयज्ञस्य हन्ता तदनु जयति भेत्ता षण्मुखः क्रौञ्चशत्रुः । तदनु जयति कृत्स्नां शुभ्रकैलासकेतुं विनिहतवरवैरी चार्यको गां विशालाम् ॥ ४६ ॥
वसन्तसेना—उस नीच ने मार डाला था इस सज्जन ने जीवन दे दिया, जिन्दा कर दिया ।
चारुदत्त—अकारणबन्धु तुम कौन हो ?
भिक्षु—आर्य ! आप मुझे नहीं पहचानते हैं ? मैं आर्य के चरण दबाने की चिन्ता करने वाला संवाहक जुआरियों द्वारा पकड़ लिया गया था इस उपासिका ने 'आपका अपना आदमी हूँ' यह मानकर आभूषण द्वारा मुझे मुक्त करा दिया था । उस जुआ खेलने की ग्लानि से बौद्ध संन्यासी बन गया । यह आर्या भी गाड़ी बदल जाने के कारण पुष्पकरण्डक उद्यान में पहुँच गयी थी । और उस नीच ने 'मुझे अधिक नहीं मानती हो' यह कहकर भुजपाश द्वारा जबरदस्ती मार डाला, मैंने देखा ।
अन्वयः--दक्षयज्ञस्य, हन्ता, वृषभकेतुः, जयति, तदनु, भेत्ता, क्रौञ्चशत्रुः, षण्मुखः, जयति, तदनु, विनिहतवरवैरी, आर्यकः, च, शुभ्रकैलाशकेतुम्, कृत्स्नाम्, विशालाम्, गाम्, जयति ॥ ४६ ॥
शब्दार्थ—दक्षयज्ञस्य = दक्ष के यज्ञ का, हन्ता = विध्वंस करने वाला, वृषभकेतुः = बैल के चिह्नवाली पताका वाले शंकर जी, जयति = जय प्राप्त कर रहे हैं, तदनु =
६२८
मृच्छकटिकम्
( प्रविश्य, सहसा )
शर्विलकः-
हत्वा तं कुनृपमहं हि पालकं भो- स्तद्राज्ये द्रुतमभिषिच्य चार्यकं तम्। तस्याज्ञां शिरसि निधाय शेषभूतां मोक्ष्येऽहं व्यसनगतं च चारुदत्तम् ॥ ४७ ॥
इसके बाद, भेत्ता=(दुश्मनों का) दलन करने वाले, क्रौञ्चशत्रुः=क्रौञ्च नामक दैत्य के दुश्मन, षण्मुखः=स्वामिकार्तिकेय, जयति=जय प्राप्त कर रहे हैं, च=और तदनु=इसके बाद, विनिहतवरवैरी=प्रधान शत्रु ( राजा पालक ) को मार डालने वाला, आर्यकः=अहीर का बेटा आर्यक, शुभ्रकैलाशकेतुम्=धवल कैलाश पर्वरूपी पताकावाली, कृत्स्नाम्=सम्पूर्ण, विशालाम्=विशाल, गाम्=पृथ्वी को, जयति=जीत रहा है॥ ४६ ॥
( नेपथ्य में कोलाहल )
अर्थ- दक्ष प्रजापति के यज्ञ का विध्वंस करने वाले वृषभध्वज=शंकर की जय हो। इसके बाद शत्रुओं का दलन करने वाले, क्रौञ्च राक्षस के शत्रु स्वामिकार्तिकेय की जय हो। और इसके बाद प्रधान शत्रु राजा पालक को मारने वाला [ अहीर का पुत्र ] आर्यक धवल कैलाशपर्वतरूपी पताकावाली सम्पूर्ण विशाल पृथ्वी को जीत रहा है, जीत लें ॥ ४६ ॥
टीका- प्रियमित्रस्यार्यकस्य राज्यप्राप्त्याऽतीवप्रसन्नः शर्विलकः स्वेष्टदेवतास्तुतिपूर्वकं तस्य राजसिंहासनारूढत्वं सूचयति—जयतीति। दक्षस्य=एतन्नामकप्रजापतेः, यः यज्ञः=यागः, तस्य हन्ता=विध्वंसकर्ता, वृषभध्वजः,=शिवः, जयति=सर्वोत्कर्षेण वर्तताम्, तदनु=एतदनन्तरम्, भेत्ता=शत्रुसमूहभेदनकरः, क्रौञ्चस्य=तदाख्यस्य दैत्यस्य, शत्रुः=विनाशकः, षण्मुखः=स्वामिकार्तिकेयः, जयति=सर्वोत्कर्षेण वर्तताम्, तदनु=तदनन्तरम्, विनिहतः=विनाशितः, वरः=प्रधानः, शत्रुः=रिपुः, पालको राजा येन सः, आर्यकः=एतन्नामकः गोपालपुत्रकः, शुभ्रः=धवलः, कैलासः=एतन्नामकः पर्वतविशेषः, केतुः=पताका यस्यास्ताम्, कृत्स्नाम्=सम्पूर्णाम्, विशालाम्=विस्तीर्णाम्, गाम्=पृथिवीम्, जयति=स्वायत्तीकरोतु इत्यर्थः, यद्वा पृथिव्यां सर्वतोत्कर्षेण वर्ततामित्यर्थः। मालिनी वृत्तम् ॥ ४६ ॥
अन्वयः- भोः ! अहम्, हि, तम्, कुनृपतिम्, हत्वा, तद्राज्ये, च, तम्, आर्यकम्, द्रुतम्, अभिषिच्य, तस्य, च, शेषभूताम्, आज्ञाम्, शिरसि, निधाय, अहम्, व्यसनगतम्, चारुदत्तम्, मोक्ष्ये ॥ ४७ ॥
शब्दार्थ- भोः=अरे सज्जनों!, अहम्=मैं, हि=निश्चितरूप से, तम्=उस,
दशमोऽङ्कः ६२६
हत्वा रिपुं तं बलमन्त्रिहीनं पौरान्समाश्वास्य पुनः प्रकर्षात् । प्राप्तं समग्रं वसुधाधिराज्यं राज्यं बलारेरिव शत्रुराज्यम् ॥४८॥
कुनृपतिम्=दुष्ट राजा पालक को, हत्वा=मारकर, च=और, तद्राज्ये=उसके राज्य में [ सिंहासन पर ], तम्=उस, आर्यकम् =आर्यक को, द्रुतम्,=शीघ्र ही, अभिषिच्य=अभिषिक्त करके, च=और, तस्य=उस राजा ( आर्यक ) की, शेषभूताम्=अन्तिम, आज्ञाम्=आदेश को, शिरसि=सिर पर, निधाय=रखकर, अहम्=मैं, शर्विलक, व्यसनगतम्=आपत्ति में पड़े हुये, चारुदत्तम्=चारुदत्त को, मोक्ष्ये=मुक्त करूँगा, अर्थात् करवाऊँगा ॥ ४७ ॥
अर्थ--( प्रवेश करके, अचानक )
शर्विलक-- हे सज्जनों ! उस दुष्ट राजा पालक को मारकर और उसके राज्य पर आर्यक को शीघ्र ही अभिषिक्त करके उस राजा आर्यक की अन्तिम=प्रधान आज्ञा को शिर से धारण करके विपत्ति में पड़े हुये चारुदत्त को मुक्त करूँगा, अर्थात् छुड़वा दूँगा ॥ ४७ ॥
टीका-- पालकस्य वधं पौराणां समाश्वासनं चारुदत्तस्य मुक्ति च सूचयति शर्विलकः -हत्वेति । भोः=इदं सम्बोधनम्, अहम्=शर्विलकः, तम्=सर्वविदितम्, कुनृपतिम्=कुत्सितं राजानम्, पालकम्, हत्वा=मारयित्वा, तम् च=पूर्वं सिद्धादेशेन निर्दिष्टं भाविनं राजानम्, आर्यकम्=गोपालपुत्रकम्, तद्राज्ये=पालकराज्ये, द्रुतम्=शीघ्रम्, अभिषिच्य=अभिषिक्तं कृत्वा, तस्य=आर्यकस्य, शेषभूताम्=अवशिष्टाम्, प्रमुखां वा, आज्ञाम्=आदेशम्, शिरसि=मस्तके, निधाय=कृत्वा, व्यसनगतम्=विपद्ग्रस्तम्, चारुदत्तम्=तन्नामकं सज्जनम्, अहम्=शर्विलकः, मोक्ष्ये=मोचयिष्यामि । इदं भाविघटनायाः सूचकम् । प्रहर्षिणी वृत्तम् ॥ ४७ ॥
अन्वयः-- बलमन्त्रिहीनम्, तम्, रिपुम्, हत्वा, पुनः, प्रकर्षात्, पौरान्, समाश्वास्य बलारेः, राज्यम्, इव, वसुधाधिराज्यम्, समग्रम्, शत्रुराज्यम्, प्राप्तम् ॥ ४८ ॥
शब्दार्थ-- बलमन्त्रिहीनम्=सेना और मन्त्रियों से रहित, तम्=उस, रिपुम्=शत्रु ( राजा पालक ) को, हत्वा=मारकर, पुनः=फिर, प्रकर्षात्=अपने प्रभाव का आश्रय लेकर, पौरान्=पुरवासियों को, समाश्वास्य=समाश्र्वस्त करके, बलारेः=बलासुर के शत्रु इन्द्र के, राज्यम्=राज्य के, इव=समान, वसुधाधिराज्यम्=पृथिवी के साम्राज्य, समग्रम्=समस्त, शत्रुराज्यम्=शत्रु के राज्यको, प्राप्तम्=पा लिया है ॥ ४८ ॥
अर्थ-- सेना और मन्त्रियों से रहित उस शत्रु [ पालक ] को मार कर [ अपने ] प्रभाव का आश्रय लेकर पुरवासियों को पुनः समाश्वस्त करके, बल नामक दैत्य के
६३० मृच्छकटिकम्
(अग्रतो निरूप्य) भवतु, अत्र तेन भवितव्यम्, यत्रायं जनपादसमवायः। अपि नामायमारम्भः क्षितिपतेरार्यकस्यार्यचारुदत्तस्य जीवितेन सफलः स्यात्। (त्वरिततरमुपसृत्य) अपयात जाल्माः ! । (दृष्ट्वा, सहर्षम्) अपि ध्रियते चारुदत्त. सह वसन्तसेनया ? संपूर्णाः खल्वस्मत्स्वामिनो मनोरथाः।
दिष्ट्या भो व्यसनमहार्णवादपारा- दुत्तीर्णं गुणवृतया सुशीलवत्या। नावेव प्रियतमया चिरान्निरीक्षे ज्योत्स्नाढ्यं शशिनमिवोपरागमुक्तम् ॥ ४६ ॥
शत्रु इन्द्र के राज्य [ स्वर्गपुरी ] के समान सम्पूर्ण पृथिवी के शासन वाले शत्रु के सारे राज्य को अपने अधिकार में कर लिया है ।। ४८ ।।
टीका—सैन्यमन्त्रिशक्तिहीनस्य राज्ञः पालकस्य वधं, पुरवासिनां शासन-परिवर्तनेन जातभीतिनिराकरणं सम्पूर्णे राज्ये आर्यकस्य आधिपत्यं च सूचयितुमाह-हत्वेति। बलानि=सैन्यानि, मन्त्रिणश्च=अमात्याश्च तैः हीनः=रहितः, तम्, रिपुन्=शत्रुम्, पालकमित्यर्थः, हत्वा=मारयित्वा, प्रकर्षात्=प्रभावमाश्रित्य, ल्यब्लोपे पञ्चमी बोध्या, पौरान्=पुरवासिलोकान्, समाश्वास्य=सान्त्वयित्वा, बलारेः=बलनामकदैत्यशत्रोः, इन्द्रस्येत्यर्थः, राज्यम्=स्वर्गम्, यद्वा इन्द्रत्वमित्यर्थः, इव=तुल्यम्, वसुधायाः=पृथिव्याः, अधिराज्यम्=साम्राज्यम्, समग्रम्=सम्पूर्णम्, शत्रुराज्यम्=रिपोः पालकस्य राज्यम्, प्राप्तम्=अधिगतम् । अत्रोपमालंकारः, इन्द्रवज्रा वृत्तम् ॥४८॥
विमर्शः--शर्विलक का तात्पर्य यह है कि राजा पालक का साथ देने के लिये न तो सेना थी और न मन्त्री । सभी उसकी मूर्खता और दुष्टता से परेशान थे। उसका साम्राज्य इन्द्रपुरी के समान अति सम्पन्न था । उसे विप्लव करके प्राप्त किया है । किन्तु सामान्य प्रजा को समाश्वस्त कर दिया गया है कि उन्हें कोई कष्ट नहीं होगा ।। ४८ ।।
अर्थ—(आगे देखकर) अच्छा, उन (चारुदत्त) को यहाँ होना चाहिये जहाँ जनपद के लोगों की भीड़ है। राजा आर्यक का यह कार्य [राज्याभिषेक] आर्य चारुदत्त के जीवित रह जाने से सफल हो जाता। (बहुत जल्दी पास जाकर) अरे धूर्तों ! हटो। (देखकर हर्षसहित) क्या वसन्तसेना के साथ आर्य चारुदत्त जीवित हैं ? हमारे राजा (आर्यक) के सभी मनोरथ सफल हो गये।
अन्वयः--भोः, नावा, इव, गुणधृतया, सुशीलवत्या, प्रियतमया, अपारात्, व्यसनमहार्णवात्, उत्तीर्णम्, उपरागमुक्तम्, ज्योत्स्नाऽढ्यम्, शशिनम्, इव, दिष्ट्या, चिरात्, निरीक्षे ॥४६॥
दशमोऽङ्कः ६३१
तत्कृतमहापातकः कथमिवैनमुपसर्पामि ? अथवा, सर्वत्रार्जवं शोभते ।
( प्रकाशमुपसृत्य बद्धाञ्जलिः ) आर्यचारुदत्त !
चारुदत्तः—ननु को भवान् ?
शब्दार्थ —भोः=हे सज्जनों !, नावा=नौका, इव=के समान, गुणधृतया= गुण=अनुरागादि से आकृष्ट, [ नौकापक्ष में-गुण=रस्सी आदि से खींची गयी ], सुशीलवत्या=सच्चरित्रवाली, प्रियतमया=प्रेयसी वसन्तसेना द्वारा, अपारात्=पार न कर सकने योग्य, व्यसनमहार्णवात्=विपत्तिरूपी समुद्रसे, उत्तीर्णम्=पार किये गये [ आर्य चारुदत्त ] को, उपरागमुक्तम्=राहु के ग्रास से निकले हुये, ज्योत्स्नाढ्यम्=चांदनी से युक्त, पूर्णमासी वाले, शशिनम्=चन्द्रमा, इव=के समान, दिष्ट्या=भाग्यवश, चिरात्=बहुत समय के पश्चात्, निरीक्षे=देख रहा हूँ ॥४६॥
अर्थ—हे सज्जनों ! नौका के समान, अनुरागादि गुणयुक्त, सच्चरित्रा प्रियतमा वसन्तसेना के द्वारा, पार न कर सकने योग्य विपत्तिरूपी महासागर से पार निकाले गये [ प्रिय मित्र चारुदत्त ] को, राहुग्रास से मुक्त चान्दनी से युक्त चन्द्रमा के समान, भाग्यवश बहुत समय बाद देख रहा हूँ ॥४६॥
टीका—वसन्तसेनासहितं चारुदत्तं दृष्ट्वाऽतीवप्रसन्नः शर्विलकः स्वहर्षोतिरेकं प्रकटयति —दिष्ट्येति । भोः=हे नागरजना इति शेषः, नावा=नौकया, इव=तुल्यया, गुणधृतया=गुणः=अनुरागादिः, नौकापक्षे-गुणः=रज्जुः, तेन, धृतया=आकृष्टया, एकत्र प्रियतमस्य उज्जजीवनार्थम् अन्यत्र च वाहनार्थमिति भावः, सुशीलवत्या=सच्चरित्रया, प्रियतमया=प्रेयस्या वसन्तसेनेत्यर्थः, कर्त्र्या, अपारात्=पारं कर्तुमयोग्यात्, व्यसनम्=मृत्युवधादिरूपा विपद् एव, महार्णवः=महासागरः, तस्मात्=उत्तीर्णम् पारं गतमिति भावः, आर्यचारुदत्तमिति शेषः, उपरागात्=ग्रासात्, मुक्तम्=परित्यक्तम्, ज्योत्स्नया=चन्द्रिकया, आढ्यम्=युक्तम्, सम्पूर्णमण्डलम्, शशिनम्=पौर्णमासीचन्द्रम्, इव, दिष्ट्या=भाग्यवशात्, चिरात्=बहुकालात् परम्, निरीक्षे=पश्यामि । यथा राहुणा ग्रस्तस्य चन्द्रस्य मुक्तिः लोकानामानन्ददायिनी भवति तथैव मृत्युमुखात् मुक्तस्य प्रियतमासहितस्य चारुदत्तस्य दर्शनमपि ममातीवानन्दकरमिति बोध्यम् । अत्र रूपकोपमादीनां संसृष्टिरलंकारः, प्रहर्षिणी वृत्तम् ॥४९॥
अर्थ—तो महापाप ( चारुदत्त के घर वसन्तसेना के धरोहर के गहनों को चुराने ) वाला मैं इसके पास कैसे चलूँ ? अथवा, [ इनकी ] सरलता सर्वत्र शोभित होती है । ( प्रकट रूप में, पास जाकर हाथ जोड़कर ) आर्य चारुदत्त !
चारुदत्त—अरे, आप कौन है ?
१३२ मृच्छकटिकम्
शर्विलकः—
येन ते भवनं भित्वा न्यासापहरणं कृतम् । सोऽहं कृतमहापापस्त्वामेव शरणं गतः ॥ ५० ॥
चारुदत्तः— सखे ! मैवम् । त्वयाऽसौ प्रणयः कृतः । (इति कण्ठे गृह्णाति ।)
शर्विलकः— अन्यच्च ।
आर्यकेणार्यवृत्तेन कुलं मानञ्च रक्षता । पशुवद्यज्ञवाटस्थो दुरात्मा पालको हतः ॥ ५१ ॥
अन्वयः— येन, ते, भवनम्, भित्वा, न्यासापहरणम्, कृतम्, कृतमहापापः, सः, अहम्, त्वाम्, एव, शरणम्, गतः ।।५०।।
शब्दार्थ— येन = जिसने, ते = तुम्हारे, भवनम् = घर को, भित्वा = फोड़ कर, सेंध लगाकर, न्यासापहरणम् = धरोहर के गहनों का अपहरण, चोरी, कृतम् = किया था, कृतमहापापः = महान् पाप करने वाला, सः = वह, अहम् = मैं, शर्विलक, त्वाम् = तुम्हारी, एव = ही, शरणम् = शरण में, गतः = प्राप्त हुआ हूँ ।।५०।।
अर्थ--शर्विलक-- जिसने आपके घर का भेदन करके ( सेंध फोड़ कर के ) धरोहर के गहनों को चुराया था । महापाप करने वाला वह मैं तुम्हारी ही शरण में आया हूँ ।।५०।।
टीका— झटिति स्वपरिचयं प्रदातुं स्वकीयं निन्दितमपि कर्म निवेदयति—येनेति । येन = मया शर्विलकेनेत्यर्थः, ते = तव, चारुदत्तस्य, भवनम् = गृहम्, भित्वा = विदार्य, तत्र सन्धि कृत्वेत्यर्थः, न्यासस्य = वसन्तसेनया निहितालंकार-समूहस्य, अपहरणम् = चौर्यम्, कृतम् = विहितम्, महापापम् = न्यासापहरणरूपं पातकं येन तादृशः, सः = पूर्वोक्तः, अहम् = शर्विलकः पापकर्त्ता त्वाम् = चारुदत्तम्, एव, शरणम् = रक्षितारम्, गतः = प्राप्तः । एवञ्च तवान्तिकं ममागमनं नोचितं तथापि शरण-प्रदत्वेन त्वयाहं रक्षितव्य इति भावः । पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ।।५०।।
अर्थ—चारुदत्त— मित्र ! ऐसा मत कहो । तुमने तो यह स्नेह किया था । ( यह कह कर गले में लिपट जाता है । )
अन्वयः— आर्यवृत्तेन, कुलम्, मानम्, च, रक्षता, आर्यकेण, यज्ञवाटस्थः, दुरात्मा, पालकः, पशुवत्, हतः ।।५१।।
शब्दार्थ— आर्यवृत्तेन = प्रशस्त चरित्रवाले, कुलम् = कुल, च = और, मानम् = सम्मान की, रक्षता = रक्षा करने वाले, आर्यकेण = आर्यक [ गोपालपुत्र ] ने, यज्ञवाटस्थः = यज्ञशाला में विद्यमान, दुरात्मा = दुष्ट प्रकृतिवाले, पालकः = पालक ( राजा ) को, पशुवत् = पशु के समान, हतः = मार डाला ।।५१।।