मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽङ्कः ६१६
**प्रथमः--**भोदु, एवं कलेम्ह । ( भवतु, एवं कुर्वः । )
( इत्युभौ चारुदत्तं शूले समारोपयितुमिच्छतः । )
( चारुदत्तः 'प्रभवति-' १०।३४ इत्यादि पुनः पठति । )
भिक्षुर्वसन्तसेना च--( दृष्ट्वा ) अज्जा ! मा दाव मा दाव । अज्जा ! एसा अहं मंदभाइणी, जाए कारणादो एसो वावादीअदि । ( आर्याः ! मा तावन्मा तावत् । आर्याः ! एषाहं मन्दभागिनी यस्याः कारणादेष व्यापाद्यते । )
चाण्डालः--( दृष्ट्वा )
का उण तुलिंदं एशा अंशपडंतेण चिउलभालेण ।
मा मेत्ति वाहलंतो उट्ठिदहत्था इदो एदि ॥ ३८ ॥
( का पुनस्त्वरितमेषांसपतता चिकुरभारेण ।
मा मेति व्याहरन्त्युत्थितहस्तेत एति ॥ ३८ ॥ )
**पहला चाण्डाल--**अच्छा, ऐसा ही करते हैं ।
( यह कह कर दोनों चारुदत्त को शूल पर चढ़ाना चाहते हैं । )
( चारुदत्त -“यदि मेरा धर्म प्रभावशाली होता है”--१०/३४ पद्य फिर पढ़ता है । )
भिक्षु और वसन्तसेना ( देखकर ) महानुभावो ! ऐसा मत करो, ऐसा मत करो । महानुभावों ! मैं ही वह अभागिनी हूँ जिसके कारण इनको मारा जा रहा है ।
अन्वयः - अंसपतिता, चिकुरभारेण, उत्थितहस्ता, मा, मा-इति व्याहरन्ती, एषा, का, पुनः, त्वरितम्, इतः, एति ॥३८॥
**शब्दार्थः -**अंसपतिता=कन्धे पर गिरे हुये, चिकुरभारेण=केशकलाप से उपलक्षित, उत्थितहस्ता=उठाये हुये हाँथोंवाली, मा मा इति=ऐसा नहीं, ऐसा नहीं ( करो ) इस प्रकार, व्याहरन्ती=चिल्लाती हुई, एषा=यह, का पुनः=कौन सी स्त्री, त्वरितम्=अति शीघ्र, इतः=इधर, एति=आ रही है ? ॥३८॥
अर्थ--चाण्डाल--( देखकर )
कंधों पर गिरने वाले केशकलाप से युक्त, हाथ ऊपर उठाये हुये 'ऐसा नहीं, ऐसा नहीं' ( करो ) यह कहती हुई कौन सी स्त्री इधर ही जल्दी-जल्दी आ रही है ? ॥३८॥
**टीका--**ससम्भ्रममागच्छन्तीं वसन्तसेनां दृष्ट्वा चाण्डालस्तर्कयति -केति । अंसयोः=स्कन्धयोः, पतता=पतनशीलेन, चिकुरभारेण=शिरस्थकेशकलापेन उपलक्षिता सती, उत्थितौ=उद्गतौ हस्तौ=करौ यस्यास्तादृशी, मा मा=नहि नहि,