मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२० मृच्छकटिकम्
वसन्तसेना--अज्जचालुदत्त ! किं ण्णेदं ? (आर्य चारुदत्त ! किं न्विदम् ?)
(इत्युरसि पतति ।)
भिक्षुः--अज्जचालुदत्त ! किं ण्णेदं ? (आर्य चारुदत्त ! किं न्विदम् ?)
(इति पादयोः पतति ।)
चाण्डालः--(सभयमुपसृत्य) कधं वशंतशेणा ? णं खु अम्हेहि शाहु णं वावादिदे । (कथं वसन्तसेना ? ननु खल्वस्माभिः साधुर्न व्यापादितः ।)
भिक्षुः--(उत्थाय) अले, जीवदि चालुदत्ते ? (अरे, जीवति चारुदत्तः ?)
चाण्डालः--जीवदि वश्शशदं । (जीवति वर्षशतम् ।)
वसन्तसेना--(सहर्षम्) पच्चुज्जीविदम्हि । (प्रत्युज्जीवितास्मि ।)
चाण्डालः--ता जाव एदं वृत्तं लाइणो जण्णवाडगदश्श णिवेदेम्ह ।
(तद्यावदेतत् वृत्तं राज्ञो यज्ञवाटगतस्य निवेदयावः ।)
(इति निष्क्रामतः ।)
शकारः--(वसन्तसेनां दृष्ट्वा, सत्रासम्) हीमादिके, केण गब्भदाशी जीवाविदा ? उक्कंताइ मे पाणाईं । भोदु, पलाइश्शं । (आश्चर्यम्, केन गर्भदासी जीवनं प्रापिता ? उत्क्रान्ता मे प्राणाः । भवतु, पलायिष्ये ।)
(इति पलायते ।)
इदं कुर्विति शेषः, इति=इत्थम्, व्याहरन्ती=आलपन्ती, एषा=पुरो दृश्यमाना, का पुनः=का स्त्री, त्वरितम्=अतिशीघ्रम्, इतः=अस्यां दिशि, एति=आगच्छतीत्यर्थः। आर्या वृत्तम् ॥३८॥
**अर्थ--वसन्तसेना--**आर्य चारुदत्त ! यह क्या है ? (ऐसा कहती हुई उसके उरस्थल पर गिर जाती है।)
**भिक्षु--**आर्य चारुदत्त ! यह क्या है ? (यह कह कर पैरों पर गिर जाता है।)
चाण्डाल--(भयसहित पास आकर) क्या वसन्तसेना ? बहुत अच्छा हुआ जो हम लोगों ने इस सज्जन का वध नहीं कर दिया ।
भिक्षु--(उठकर) अरे, चारुदत्त जीवित हैं।
**चाण्डाल--**सौ वर्षों तक जीवित रहें।
वसन्तसेना--(हर्षपूर्वक) मैं पुर्नजीवित हो गयी हूँ।
**चाण्डाल--**तब तो यह वृत्तान्त यज्ञशाला में गये राजा को सूचित कर दें।
(यह कह कर दोनों निकल जाते हैं।)
शकार--(वसन्तसेना को देखकर भयसहित) हाय, किसने यह गर्भदासी जिन्दा कर दी ? मेरे प्राण निकल गये। अच्छा, भाग चलूं।
(यह कह कर भागता है।)