मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽङ्कः ६२५
चाण्डालः-- ( उपसृत्य ) अले, णं अम्हाणं ईंदिशी लाआणत्तो—जेण शा वावादिदा, त मालेध त्ति । ता लट्टिअशालं ज्जेव अण्णेशम्ह ।
( अरे, नन्वावयोरीदृशी राजाज्ञप्तिः — येन सा व्यापादिता, तं मारयतमिति । तद्राष्ट्रियश्यालमेवान्विष्यावः । )
( इति निष्क्रान्तौ । )
चारुदत्तः-- ( सविस्मयम् )
केयमभ्युद्यते शस्त्रे मृत्युवक्त्रगते मयि ।
अनावृष्टिहते सस्ये द्रोणवृष्टिरिवागता ॥ ३६ ॥
( अवलोक्य च )
वसन्तसेना किमियं द्वितीया समागता सैव दिवः किमित्थम् ।
भ्रान्तं मनः पश्यति वा ममैनां वसन्तसेना न मृताऽथ सैव ॥ ४० ॥
चाण्डाल-- ( पास जाकर ) अरे ! हम लोगों को राजा की ऐसी आज्ञा है 'जिसने उस ( वसन्तसेना ) को मारा है, उसे मार डालो।' इस लिये अब राजा के शाल को ही खोजें।
( यह कह कर दोनों निकल जाते हैं । )
अन्वय.-- अनावृष्टिहते, सस्ये, द्रोणवृष्टिः, इव, शस्त्रे, अभ्युद्यते, मृत्युवक्त्रगते, मयि, आगता, इयम्, का ? ॥३६॥
शब्दार्थ-- अनावृष्टिहते=सूखा पड़ने से नष्ट हो रहे, सस्ये=हरे धान्य में, द्रोणवृष्टिः=द्रोणनामक मेघ की वर्षा, इव=के समान, शस्त्रे=शस्त्र [ तलवार आदि ] के, अभ्युद्यते=उठा लिए जाने पर, मृत्युवक्त्रगते=मौत के मुंह में चले गये, मयि=मेरे लिये, आगता=आयी हुई, इयम्=यह स्त्री, का=कौन है ? ॥३६॥
अर्थ-- चारुदत्त-- ( आश्चर्यसहित )
सूखा पड़ने से हरे धान्य के सूखने पर [ अभीष्ट वर्षा करने वाले ] द्रोण नामक मेघ की वर्षा के समान, शस्त्र उठा लिये जाने पर मौत के मुख में मेरे पहुँच जाने पर आयी हुई यह स्त्री कौन है ? ॥ ३९ ॥
टीका-- मृत्युमुखगतमात्मानं रक्षितुं समागतां तां द्रोणवृष्टिमिव चिन्तयन्नाह - केयमिति । अनावृष्ट्या=अवर्षणेन, हते=नश्यमाने, शुष्कप्राये, शस्ये=हरितधान्ये, द्रोणः=सस्यप्रपूरको मेघविशेषः, तस्य वृष्टिः=अपेक्षितवर्षा, इव=यथा, शस्त्रे=वधसाधने=खड्गादौ, अभ्युद्यते=मामभिलक्ष्य उत्थापिते सति, मृत्योः=कालस्य, वक्त्रम्=मुखम्, गते=आपन्ने, मयि=चारुदत्ते, आगता=मम रक्षणार्थं समागता, इयम्=पुरो वर्तमाना स्त्री, का=किन्नामधेया। अत्रोपमालंकारः, पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥३९॥
अन्वयः-- इयम्, वसन्तसेना, किम् (अथवा) द्वितीया, किम्वा, इत्थम्, दिवः,