मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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( नेपथ्ये पौराः--वावादेह, किं णिमित्तं पादकी जीवावीअदि ? ) ( व्यापादयत, किं निमित्तं पातकी जीव्यते ? )
( वसन्तसेना वध्यमालां चारुदत्तस्य कण्ठादपनीय शकारस्योपरि क्षिपति । )
**शकारः--**गब्भदाशीधीए ! पशीद पशीद, ण उण मालेश्शं, ता पलित्ताआहि । ( गर्भदासीपुत्रि ! प्रसीद प्रसीद, न पुनर्मारयिष्यामि, तत् परित्रायस्व । )
**शर्विलकः--**अरे रे ! अपनयत । आर्यचारुदत्त ! आज्ञाप्यताम्--किमस्य पापस्यानुष्ठीयताम् ।
**चारुदत्तः--**किमहं यद् ब्रवीमि तत् क्रियते ?
**शर्विलकः--**कोऽत्र सन्देहः ।
**चारुदत्तः--**सत्यम् ?
**शर्विलकः--**सत्यम् ।
**चारुदत्तः--**यद्येवम्; शीघ्रमयम् --
**शर्विलकः--**किं हन्यताम् ?
**चारुदत्तः--**नहि नहि, मुच्यताम् ।
**शर्विलकः--**किमर्थम् ?
( नेपथ्य में )
**पुरवासी लोग—**मार डालो, यह पापी क्यों जीवित है ?
( वसन्तसेना चारुदत्त के गले से बध्यमाला को हटाकर शकार के ऊपर फेंक देती है । )
**शकार—**अरे गर्भकाल से ही दासी की बच्ची ! खुश हो जा, खुश हो जा, अब फिर नहीं मारूँगा । इस लिये रक्षा करो ।
**शर्विलक—**अरे रे ! हटाओ [ इसे ] । आर्य चारुदत्त ! आज्ञा दीजिये—इस पापी का क्या किया जाय ?
**चारुदत्त—**क्या जो मैं कहूँगा, वह किया जायगा ?
**शर्विलक—**इसमें क्या सन्देह ?
चारुदत्त— सच ?
शर्विलक— सच ।
**चारुदत्त—**यदि ऐसी बात है तब तो इसे शीघ्र......
**शर्विलक—**क्या मार डाला जाय ?
**चारुदत्त--**नहीं, नहीं, छोड़ दिया जाय ।
**शर्विलक--**किस लिये ?