भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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दशमोऽङ्कः ६३६

चारुदत्त:

शत्रुः कृतापराधः शरणमुपेत्य पादयोः पतितः ।
शस्त्रेण न हन्तव्यः ... ... ... ... ... ... ... ॥

शर्विलकः-- एवं तर्हि श्वभिः खाद्यताम् ।

चारुदत्त:--

नहि
...... ...उपकारहतस्तु कर्त्तव्यः ॥ ५५ ॥

शर्विलक:-- अहो ! आश्चर्यम् । किं करोमि, वदत्वार्यः ।


चारुदत्त-- अपराध कर चुकने वाले शरण में आकर पैरों पर गिरे हुये शत्रु को शस्त्र से नहीं मारना चाहिये ।

शर्विलक-- ऐसा है तो कुत्तों द्वारा खिलवा दें ।

चारुदत्त:-- नहीं, उपकार द्वारा मरा हुआ करना चाहिये ।

अन्वयः-- [ यदि ], कृतापराधः, शत्रुः, शरणम्, उपेत्य, पादयोः, पतितः, ( तदा ), शस्त्रेण, न, हन्तव्यः, तु, उपकारहतः, कर्तव्यः ॥५५॥

शब्दार्थ-- [ यदि=यदि ] कृतापराधः=अपराध कर चुकने वाला अपराधी, शत्रु=दुश्मन, शरणम्=शरण में, उपेत्य=आकर, पादयोः=पैरों पर, पतितः=गिर पड़ा हो, [ तदा=तब ] शस्त्रेण=शस्त्र से, न=नहीं, हन्तव्यः=मारना चाहिये, तु=परन्तु, उपकारहतः=उपकार से मारा हुआ, कर्तव्यः=कर देना चाहिये ॥५५॥

अर्थ--चारुदत्त -

अपराधी भी शत्रु यदि शरण में आकर पैरों पर गिर पड़ा हो तो उसे शस्त्र से नहीं मारना चाहिये अपितु उपकार द्वारा मारा हुआ कर देना चाहिये अर्थात् उसका इतना उपकार कर देना चाहिये कि एहसान से ही मर जाय ॥५५॥

टीका-- कृतापराधिनं शत्रुं प्रति कथमाचरणीयमिति प्रतिपादयितुकामश्चारुदत्तः शकारस्य मुक्तये निर्दिशन्नाह - शत्रुरिति । कृतापराधः=पूर्वं विहितापराधः, शत्रुः=रिपुः, यदि=चेत्, शरणम्=रक्षकम्, उपेत्य=प्राप्य, पादयोः=चरणयोः, पतितः-लुठितः, जीवनदानभिक्षयेति भावः, तदा, शस्त्रेण=आयुधेन, न=नैव, हन्तव्यः=विनाशयः, उपकारेण=अनुग्रहप्रदर्शनेन, हतः=मारितः, कर्तव्यः=विधेयः, तस्मिन् एतावाननुग्रहो विधेयो येन स स्वयमेव लज्जामनुभूय स्वापराधं प्रति दुःखितो भूत्वा प्राणान् त्यजेदिति भावः । पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥५५॥

विमर्शः-- यहाँ चारुदत्त के चरित्र का उत्कर्ष अवर्णनीय है ॥५५॥

शर्विलक-- अहो ! आश्चर्य है । आर्य ! बताइये मैं क्या करूँ ।