भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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६४० मृच्छकटिकम्

चारुदत्तः— तन्मुच्यताम् ।
शर्विलकः— मुक्तो भवतु ।
शकारः— हीमादिके । पच्चुज्जोविदेम्हि ।
( हन्त । प्रत्युज्जीवितोऽस्मि । ) ( इति पुरुषैः सह निष्क्रान्तः । )

( नेपथ्ये कलकलः )

पुनर्नेपथ्ये— एसा अज्जचारुदत्तस्स बहुआ अज्जा धूदा पदे वसणञ्चले विलगन्तं दारअं अक्खिवन्ती बाप्फभरिद-णअणेहि जणेहि णिवारिज्जमाणा पज्जलिदे पावए पविसदि । ( एषा आर्यचारुदत्तस्य वधूरायां धूता पदे वसनाञ्चले विलगन्तं दारकमाक्षिपन्ती बाष्पभरित-नयनैर्जनैर्निवार्यमाणा प्रज्वलिते पावके प्रविशति । )

शर्विलकः— ( आकर्ण्य नेपथ्याभिमुखमवलोक्य ) कथं चन्दनकः ? चन्दनक ! किमेतत् ?

चन्दनकः— ( प्रविश्य ) किं ण पेक्खदि अज्जो ? महाराअप्पासादं दक्खिणेण महन्तो जणसंमद्दो वट्ठदि । ( एसा-इत्यादि पुनः पठति ) कथिदं अ मए तीए, जधा—अज्जे ! मा साहसं करेहि, जीवादि अज्जचारुदत्तो त्ति । परन्तु दुक्ख-आववुडदाए को सुणेदि ? को पत्तिआअदि ! ( किं न प्रेक्षते आर्यः ? महाराजप्रासादं दक्षिणेन महान् जनसम्मर्दो वर्त्तते । ) (कथितञ्च मया तस्यै


चारुदत्त— तब छोड़ दीजिये ।
शर्विलक— मुक्त हो जाय । ( छोड़ दिया जाय । )
शकार— ओह ! फिर से जीवित हो गया । ( ऐसा कह कर लोगों के साथ निकल गया । )

( नेपथ्य में—कोलाहल )

फिर नेपथ्य में-यह आर्य चारुदत्त की धर्मपत्नी आर्या धूता पैरों पर वस्त्रों पर लिपटने वाले बालक को अलग करती हुई, आंसुओं से पूरित नेत्रों वाले लोगों के द्वारा रोकी जाती हुई ( भी ) जलती आग में घुस रही है ।

शर्विलक— ( सुनकर नेपथ्य की ओर देख कर ) क्या चन्दनक ? चन्दनक ! यह क्या है ?

चन्दनक— ( प्रवेश करके ) श्रीमान् नहीं देख रहे हैं क्या ? महाराज के महल की दाहिनी ओर लोगों की विशाल भीड़ है । ( यह आर्य चारुदत्त की पत्नी आग में प्रवेश कर रही है-इत्यादि दुबारा कहता है । ) मैंने उससे यह