भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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६४२ मृच्छकटिकम्

शर्विलकः--अहो ! प्रमादः ।

त्वरया सर्पणं तत्र मोहमार्योऽत्र चागतः ।
हा धिक् प्रयत्नवैकल्यं दृश्यते सर्वतोमुखम् ॥ ५७ ॥

येन आवयोः सहैव स्वर्गसुखप्राप्तिः स्यादिति भावः । प्रमिताक्षरा वृत्तम्, एतल्लक्षणम्--“प्रमिताक्षरा सजससैः कथिता ॥५६॥

विमर्श--अपनी पत्नी के आचरण से अत्यन्त प्रसन्न और सन्तुष्ट रहने वाला चारुदत्त उसी की मृत्यु का समाचार सुनकर अति व्याकुल हो जाता है। वसन्तसेना उसे मिल चुकी है फिर भी वह अपनी पतिव्रता पत्नी को किसी भी स्थिति में छोड़ना सहन नहीं कर सकता। वह उसे पतिव्रता के धर्मों का संकेत करके अकेले स्वर्ग-सुख-प्राप्ति का निषेध करता है। हारीत ने पतिव्रता का यह लक्षण किया है—

आर्त्तार्ते, मुदिता हृष्टे, प्रोषिते मलिना कृशा ।
मृते म्रियेत या पत्यौ सा स्त्री ज्ञेया पतिव्रता ॥५६॥

अन्वयः--तत्र, त्वरया, सर्पणम्, ( अपेक्षितम् ) अत्र, च, आर्यः, मोहम्, आगतः, हां धिक्, सर्वतोमुखम्, प्रयत्नवैकल्यम्, दृश्यते ॥५७॥

शब्दार्थ--तत्र=वहाँ [ आर्या धूता के पास ), त्वरया=जल्दीसे, सर्पणम्=पहुँचना, ( अपेक्षितम्=अपेक्षित, है) च=और, अत्र=यहाँ, आर्यः=श्रीमान्, चारुदत्त, मोहम्=मूर्च्छा को, आगतः=प्राप्त हो गये, मूर्छित हो गये, हा धिक् !=हाय धिक्कार है, सर्वतोमुखम्=सभी ओर, प्रयत्नवैकल्यम्=प्रयासों की विफलता, दृश्यते=दिखाई पड़ रही है ॥५७॥

अर्थ--शर्विलक--हाय ! बहुत बड़ी असावधानी ( हो गयी ) ।

वहाँ ( आर्या धूता के पास ) जल्दी जाना ( अपेक्षित ) है और यहाँ आर्य ( चारुदत्त ) मूर्छित हो गये हैं। हाय धिक्कार है, सभी ओर प्रयासों की विफलता दिखाई दे रही है ॥५७॥

टीका--मूर्च्छितस्य चारुदत्तस्य धूतासमीपे गमनमतिदुष्करमिति तस्याः प्राणरक्षणं दुःशकमिति विचिन्त्य शर्विलकः स्वप्रयासवैकल्यं विलोकयन् आह--त्वरयेति । तत्र=तस्मिन् स्थाने यत्रार्या धूता अग्नौ प्रविश्य स्वप्राणान् परित्यक्तुं प्रयतमानावस्ति, त्वरया=अतिशीघ्रमेव, सर्पणम्=गमनम्, अपेक्षितम्, च=किन्तु, अत्र=अस्मिन् स्थाने, आर्यः=श्रीमान् चारुदत्त:, मोहम्=मूर्च्छाम्, आगतः=उपगतः, एवञ्च मूर्च्छितः सः स्वपत्न्याः रक्षणं कथं करिष्यतीति भावः, हा धिक्=हा कष्टम्, सर्वतोमुखम्=सर्वस्मिन् वस्तुनि, मुखम्=प्रारम्भः, प्रसक्तिर्वा यस्य तत्, सर्वतो-

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