भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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दशमोऽङ्कः ६४३

वसन्तसेना--समस्ससिदु अज्जो। तत्थ गदुअ जीवावेदु अज्जं। अण्णधा अधीरत्तणेण अणत्थो सम्भावीयदि। (समाश्वसितु आर्यः। तत्र गत्वा जीवयतु आर्याम्। अन्यथा अधीरत्वेन अनर्थः सम्भाव्यते।)

चारुदत्तः--(समाश्र्वस्य सहसोत्थाय) हा प्रिये! क्वासि? देहि मे प्रति-वचनम्।

चन्दनकः--इदो इदो अज्जो। (इत इत आर्यः।)

(इति सर्वे परिक्रामन्ति।)

(ततः प्रविशति यथानिर्दिष्टा धूता चेलाञ्चलमाकर्षन् विदूषकेनानुगम्यमानो रोहसेनो रदनिका च।)

धूता--(सास्रम्) जाद! मुञ्चेहि मं, मा विग्धं करेहि। भीआमि अज्जउत्तस्स अमङ्गलाकण्णणादो। (जात! मुञ्च माम्, मा विघ्नं कुरु, बिभेमि आर्यपुत्रस्य अमङ्गलाकर्णनात्।) (इत्युत्थाय अञ्चलमाकृष्य पावकाभिमुखं परिक्रामति।)

रोहसेनः--माद अज्जए! पडिवालेहि मं, तुए विणा ण सक्कुणोमि जीविदं धारेदुं। (मातरायें! प्रतिपालय माम्, त्वया विना न शक्नोमि जीवितं धारयितुम्।) (इति त्वरितमुपसृत्य पुनरञ्चलं गृह्णाति।)


गमीत्यर्थः, प्रयत्नानाम्=मम प्रयासानाम्, वैफल्यम्=विफलता, दृश्यते=विलोक्‍यते। एवञ्चात्र मया किंकरणीयमिति विचारयितुं न शक्यते। पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥५७॥

**अर्थ--वसन्तसेना--**आर्य धैर्य धारण करें। वहाँ जाकर आर्या [धूता] को जीवनदान करें। नहीं तो अधीर होने से अनर्थ [मृत्यु] की सम्भावना है।

चारुदत्त--(धैर्य धारण करके अचानक उठकर) हा प्रिये! कहाँ हो? मुझे उत्तर दो।

चन्दनक--इधर, इधर आइये आर्य!

(यह कहकर सभी घूमते हैं।)

(इसके बाद पहले बतलायी गयी अवस्थावाली धूता, वस्त्र के छोर को खींचता हुआ और विदूषक द्वारा अनुसरण किया जाता हुआ रोहसेन तथा रदनिका प्रवेश करते हैं।)

धूता--(आंसुओं के सहित) बेटा! मुझे छोड़ दो, विघ्न मत करो, आर्यपुत्र के अमङ्गल [मृत्युसमाचार] को सुनने से डरती हूँ। (ऐसा कहकर उठकर आँचल छुड़ाकर आग की ओर बढ़ती है।)

रोहसेन--मां आर्ये! मुझे पालो (या मेरी प्रतीक्षा करो।) तुम्हारे बिना मैं जीवनधारण नहीं कर सकता। (ऐसा कह कर शीघ्र ही पास जाकर फिर आँचल पकड़ लेता है।)

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