मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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विदूषकः--भोदीए दाव वम्हणीए भिण्णत्तणेण चिदाधिरोहणं पावं उदाहरन्ति रिसिओ । ( भवत्यास्तावत् ब्राह्मण्या भिन्नत्वेन चिताधिरोहणं पापमुदाहरन्ति ऋषयः । )
धूता--वरं पावाचरणं, ण उण अज्जउत्तस्स अमङ्गलाकण्णणं । ( वरं पापाचरणम्, न पुनरार्यपुत्रस्य अमङ्गलाकर्णनम् । )
शर्विलकः--(पुरोऽवलोक्य) आसन्नहुतवहा आर्या । तत् त्वर्यतां त्वर्यताम् । ( चारुदत्तः त्वरितं परिक्रामति । )
धूता--रअणिए ! अवलम्ब दारअं, जाव अहं समीहिदं करेमि । ( रदनिके ! अवलम्बस्व दारकम्, यावदहं समीहितं करोमि । )
चेटी--( सकरुणम् ) अहं पि जधोपदेसिणि म्हि भट्टिणीए । ( अहमपि यथोपदेशिन्यस्मि भर्त्र्याः । )
धूता--( विदूषकमवलोक्य ) अज्जो दाव अवलम्बेदु । ( आर्यस्तावदबलम्बताम् । )
विदूषकः-(सावेगम्) समीहिद-सिद्धिाए पउत्तेण बम्हणो अग्गदो कदव्वो । अदो भोदीए अहं अग्गणी होमि । (समीहितसिद्धये प्रवृत्तेन ब्राह्मणः अग्रतः कर्त्तव्यः । अतो भवत्या अहमग्रणीर्भवामि । )
विदूषक--आप ब्राह्मणी का ( पति से ) अलग होकर अर्थात् अकेले चिता पर चढ़ना ऋषि लोग पाप कहते हैं ।
धूता--पाप कर लेना अच्छा है न कि आर्यपुत्र का अमंगल ( मृत्युसमाचार ) सुनना ।
शर्विलक--( सामने देखकर ) आर्या आग के समीप ( जा चुकी ) हैं । अतः जल्दी करो जल्दी करो ।
( चारुदत्त जल्दी-जल्दी चलने लगता है । )
धूता--रदनिका ! बच्चे को पकड़ो, तब तक मैं अपना अभीष्ट ( अग्नि प्रवेश ) कर लूं ।
चेटी--( करुणापूर्वक ) आप जैसा कह रही हैं वैसा ही मैं भी आपसे कहने वाली हूँ । अर्थात् मुझे पहले आग में प्रवेश कर लेने दो, आप बच्चे को पकड़िये ।
धूता--( विदूषक की ओर देखकर ) तो आर्य ! आप ही पकड़ लीजिये ।
विदूषक--( घबड़ाहट के साथ ) अभीष्ट की सिद्धि के लिये ब्राह्मण को आगे करना चाहिये । अतः मैं आपके आगे-आगे चलता हूँ ।