भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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दशमोऽङ्कः ६४५

धूता—कधं पच्चादिट्ट म्हि दुवेहि । (बालकमालिङ्ग्य) जाद ! तुमं ज्जेव पज्जवट्टावेहि अत्ताणं अम्हाणं तिलोदअदाणाअ अदिक्वन्ते किं मणोरहेहिं । (सनिःश्वासम्) ण क्खु अज्जउत्तो तुमं पज्जवट्टाविस्सदि । (कथं प्रत्यादिष्टास्मि द्वाभ्याम् । )( जात ! त्वमेव पर्यवस्थापय आत्मानम् अस्माकं तिलोदकदानाय । अतिक्रान्ते किं मनोरथैः । ) ( न खल्वार्यपुत्रस्त्वां पर्यवस्थापयिष्यति । )

चारुदत्तः—(आकर्ण्य सहोपसृत्य) अहमेव पर्यवस्थापयामि बालिशम् ।
( इति बालकं बाहुभ्यामुत्थाप्य वक्षसाऽऽलिङ्गति । )

धूता—( विलोक्य ) अम्महे ! अज्जउत्तस्स ज्जेव स्सरसञ्जोओ । (पुन-निपुणं निरूप्य सहर्षम्) दिट्ठिआ अज्जउत्तो ज्जेव एसो । पिअं मे पिअं (अहो ! आर्यपुत्रस्यैव स्वरसंयोगः । ) ( दिष्ट्या आर्यपुत्र एवैषः । प्रियं मे प्रियम् । )

बालकः —( विलोक्य सहर्षम् ) अम्हो ! आवुको मं परस्सजदि । ( धूतां प्रति ) अज्जए ! वड्ढवीअसि आवुको ज्जेव मं पज्जवट्टावेदि ! (इति प्रत्या-लिङ्गति ) ( अहो ! तातो मां परिष्वजति । ) ( आर्ये ! वर्द्धसे, तात एव मां पर्यवस्थापयति । )

चारुदत्तः—( धूतां प्रति )

हा प्रेयसि ! प्रेयसि विद्यमाने कोऽयं कठोरो व्यवसाय आसीत् ।
अम्भोजिनी लोचनमुद्रणं किं भानावनस्तंगमिते करोति ? ॥५८॥


धूता—क्या दोनों ने अस्वीकार कर दिया ? ( बच्चे का आलिङ्गन करके ) बेटा ! हम लोगों को तिलजल देने के लिये तुम्हीं अपने पर संयम रक्खो, अर्थात् जीवित रहने का धैर्य रखो । ( तुम्हारे ) मर जाने पर हम लोगों के मनोरथ व्यर्थ हो जायेंगे । आर्यपुत्र तुम्हारा पालन ( रक्षा ) नहीं कर पायेंगे ।

चारुदत्त—(सुनकर अचानक पास पहुँचकर) मैं ही बालक की रक्षा करूँगा ।
( यह कह कर बच्चे को हाथों से उठाकर हृदय से आलिंगन कराता है । )

धूता—( देखकर ) अरे, यह तो आर्यपुत्र की ही आवाज है । ( फिर अच्छी तरह देखकर हर्षसहित ) भाग्यवशात् यह आर्यपुत्र ही हैं । हमारा प्रिय है प्रिय है ।

बालक—(देखकर हर्षसहित ) अहो ! पिता जी मेरा आलिंगन करते हैं । ( धूता की ओर ) आर्ये ! वृद्धि हो रही है, पिता ही मेरा पालन कर रहे हैं । ( ऐसा कह-कह बदले में आलिंगन करता है । )

अन्वयः—हा प्रेयसि ! प्रेयसि, विद्यमाने, ( अपि ), कः, अयम्, कठोरः, व्यवसायः, आसीत्, किम्, भानौ, अनस्तङ्गमिते, ( अपि ), अम्भोजिनी, लोचन-मुद्रणम्, करोति ? ॥ ५८ ॥