मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 740, कुल 760 में से
संदर्भ में पढ़ें१५२ मृच्छकटिकम्
मोदन्तां जन्मभाजः, सततमभिमता ब्राह्मणाः सन्तु सन्तः
श्रीमन्तः, पान्तु पृथ्वीं प्रशमितरिपवो धर्मनिष्ठाश्च भूपाः ॥६१॥
( इति निष्क्रान्ताः सर्वे । )
संहारो नाम दशमोऽङ्कः ।
समाप्तं मृच्छकटिकम्
—०—
सततम्, मोदन्ताम्, ब्राह्मणाः, अभिमताः, सन्तु, सन्तः, श्रीमन्तः, सन्तु, भूपाः, च, प्रशमितरिपवः, धर्मनिष्ठाः, पृथिवीम्, पान्तु ॥६१॥
शब्दार्थ—गावः=गायें, क्षीरिण्यः=दूधवाली, सन्तु=हों, वसुती=पृथिवी, सर्व-सस्यसम्पन्ना=सभी प्रकार के धान्यों से परिपूर्ण, भवतु=हो, पर्जन्यः=मेघ, कालवर्षी=समय पर वर्षा करने वाला, [ भवतु=हो ], वाताः=हवायें, सकलजनमनोनन्दिनः=समस्तलोगों के मन को आनन्द देनेवाली, ( सन्तः=होती हुयीं ) वान्तु=बहें, बजें, जन्मभाजः=जन्म लेने वाले सभी प्राणी, सततम्=सदैव, मोदन्ताम्=खुश रहें, ब्राह्मणाः=ब्राह्मणलोग, अभिमताः=सब के प्रिय, सन्तु=हों, सन्तः=सदाचारी लोग, श्रीमन्तः=धनादिसम्पन्न, सन्तु=रहें, च=और, भूपाः=राजा लोग, प्रशमितरिपवः=शत्रुओं का शमन [नाश] करनेवाले, धर्मनिष्ठाः=धर्मपरायण, ( सन्तः=होते हुये ) पृथिवीम्=पृथ्वी का, पान्तु=पालन करें ॥ ६१ ॥
अर्थ—फिर भी, यह हो—
( भरतवाक्य )
गायें खूब दूध देने वालीं हों । पृथिवी ( सर्वविध ) धान्यों से परिपूर्ण हो । मेघ समय पर वर्षा करने वाला हो । हवायें सभी के मन को आनन्द देने वाली होती हुयी बहें । जन्म लेने वाले सभी प्राणी सदैव आनन्द प्राप्त करें, सुखी रहें । ब्राह्मण लोग सबके प्रिय बनें । सदाचारी लोग धनवान बनें । राजा लोग शत्रुओं का शमन करने वाले और धर्मपरायण होते हुये पृथिवी का पालन करें ॥ ६१ ॥
( यह कह कर सभी निकल जाते हैं । )
॥ इस प्रकार 'संहार' नामक दशम अंक समाप्त हुआ ॥
॥ इस प्रकार मृच्छकटिक समाप्त हुआ ॥
—: ० :—