मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| प्रथमोऽङ्कः | १६ |
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अन्वयः—येन क्रोधाग्नौ नन्दवंशः प्रसभम् अदाहि स एष कुटिलमतिः कौटिल्यः 'चन्द्रस्य ग्रहणम्' इति श्रुतेः सनाम्नः मौर्येन्दोः द्विपदभियोग इति अवैति ॥७॥
व्याख्याः—येन बुधेन, क्रोधाग्नौ—कोपवह्नौ, नन्दवंशः—राज्ञो नन्दस्य, कुलम्, अदाहि—भस्मीकृतः, स एषः—नेपथ्यावस्थितो जनः, कुटिलमतिः—क्रूरबुद्धिः, कौटिल्यः—चाणक्यः, 'चन्द्रस्य ग्रहणम्' इति श्रुतेः—श्रवणात्, सनाम्नः—समानाख्यस्य, मौर्येन्दोः—इन्द्रसदृशस्य चन्द्रगुप्तस्य, द्विपदभियोगः—द्विपता शत्रुगा, अभियोगः आक्रमणम्, इति—एतत्, अवैति—जानाति ॥७॥
तत्—तस्मात्, इतः—अस्मात् स्थानात्, आवां, गच्छावः। इति, निष्क्रान्तौ—रङ्गमञ्चादपगतौ। इति एतन्मात्रं, प्रस्तावना—कथामुखम्।
हिन्दी अनुवाद—नटी—आर्य ! फिर यह कौन है, जो पृथ्वी पर स्थित होकर चन्द्र को ग्रह के आक्रमण से बचाना चाहता है ?
सूत्रधार—आर्ये ! सत्य तो यह है कि मैने भी नही पहचाना । अच्छा, पुनः सावधान होकर गले की पहचान करूँगा । [ फिर वही 'क्रूरग्रहः' इत्यादि पढ़ता है । ]
[ नेपथ्य में ]
आह, यह कौन मेरे रहते चन्द्रगुप्त को जीतने की इच्छा करता है ?
सूत्रधार—[ सुनकर ] आर्ये ! समझ गया । (ये) कौटिल्य हैं।
[ नटी भय का नाट्य करती है । ]
सूत्रधार—जिन्होंने क्रोध की अग्नि मे नन्दवंश को हठात् जला दिया, वहीं ये कुटिल बुद्धि वाले चाणक्य 'चन्द्र का ग्रहण' यह सुनने से समान नाम वाले चन्द्रगुप्त पर शत्रु ( राक्षस और मलयकेतु ) का आक्रमण हो रहा है—ऐसा मानते है ॥७॥
इसलिए यहाँ से हम दोनों चले । [ दोनों चल देते है । ]
प्रस्तावना समाप्त
टिप्पणी—धरणीगोचरः—पृथ्वी पर दिखाई पडने वाला (ग्रह) । गावः चरन्ति अस्मिन् इति गो√चर्+घ अधिकरणे संज्ञायाम्=गोचरः । गोचर