मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽङ्कः ५६
चाणक्य—शार्ङ्गरव ! शार्ङ्गरव !
[ प्रवेश करके ]
शिष्य—आचार्य ! आज्ञा दीजिए ।
चाणक्य—वत्स ! दवात और कागज ले आओ ।
शिष्य—आचार्य की जो आज्ञा । [ बाहर जाकर और फिर प्रवेश करके ] आचार्य ! यह दवात और कागज है ।
चाणक्य—[ पत्र लेकर मन में ] इस पर क्या लिखूँ ? इसी लेख से तो राक्षस को जीतना है ।
[ प्रवेश करके ]
प्रतीहारी—आर्य की जय हो ।
चाणक्य—[ हर्षपूर्वक मन में ] 'जय' शब्द का ग्रहण कर लिया ( अर्थात् विजय मिल गई ) । [ प्रकट ] शोणोत्तरे ! कैसे आना हुआ ?
टिप्पणी—नचिरात्—शीघ्र । यहाँ 'न' नञ् से भिन्न निषेधार्थक अव्यय है । 'चिरात्' भी चिरार्थक अव्यय है । न चिरात् सुप्सुपा स० । अपवर्गे तृतीया । अव्ययत्वात् सुब्लोपः । किमत्र लिखामि—यहाँ चाणक्य अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये पुनः उद्यम करता है । अतएव गुप्तचर के वृत्तान्त से अन्तरित बीज की पुनः प्रवर्त्तना होने के कारण यह बिन्दु है । कहा भी है—'अवान्तरार्थविच्छेदे विन्दुरच्छेदकारणम्' साहित्यदर्पण । प्रतीहारी—राजा के निकटवर्ती द्वार पर रहने वाली स्त्री प्रतिहारी कहलाती है । यह सन्धिविग्रह आदि कार्यों का निवेदन करती है—
'द्वारि द्वाःस्थे प्रतीहारः प्रतीहार्यप्यनन्तरे । सन्धिविग्रहसम्बद्धं नानाकार्यसमुत्थितम् ॥
निवेदयन्ति याः कार्यं प्रतीहार्यस्तु ताः स्मृताः ।'
राक्षसो जेतव्यः—चाणक्य जैसे ही इन शब्दो का उच्चारण करता है वैसे ही एक अप्रत्याशित व्यक्ति आकर कहता है—'आपकी जय हो' । चाणक्य इसे शुभ शकुन समझकर अपनी भावी विजय के सम्बन्ध मे आशान्वित होते हुए कह उठता है—'जय मिल गई' । नाटक की परिभाषा में इसको 'गण्ड' कहते हैं—'गण्डः प्रस्तुतसम्बन्धिभिन्नार्थं सहसोदितम्' । गृहीतोऽयं जय शब्दः—यह इस नाटक का पहला पताकास्थान है, जिसका लक्षण यह है—'यत्रार्थे