मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽङ्कः ६६।
प्रख्याप्य—संकीर्त्य, -शूलम्—तदाख्यं शस्त्रविशेषम्, आरोप्यताम्—आरोप्यताम्,। अस्य—शकटदासस्य, गृहजनश्च—परिवारश्च, बन्धनागारं—कारागृहे,। प्रवेश्यताम्—निक्षिप्यताम् ।
हिन्दी अनुवाद—सिद्धार्थक—जो आर्य की आज्ञा ।
चाणक्य—शार्ङ्गरव—शार्ङ्गरव !
[ प्रवेश करके ]
शिष्य—आचार्य ! आज्ञा दीजिये ।
चाणक्य—मेरी ओर से कालपाशिक और दण्डपाशिक से कहो कि चन्द्रगुप्त की आज्ञा है कि जीवसिद्धि नामक जिस क्षपणक ने राक्षस की प्रेरणा से विष-कन्या के द्वारा पर्वतक की हत्या करवायी है, उसे इसी अपराध की घोषणा करके अपमान के साथ नगर से निकाल दिया जाय ।
शिष्य—जो आज्ञा । [ चलने लगता है । ]
चाणक्य—वत्स ! ठहरो ठहरो । और जो यह दूसरा शकटदास नाम का कायस्थ राक्षस की प्रेरणा से हमारे शरीर ( चन्द्रगुप्त ) से द्रोह करने के लिये यहाँ ( पाटलिपुत्र में ) सतत प्रयत्न करता रहता है, उसको भी इस अपराध की घोषणा करके शूली पर चढ़ा दिया जाय और उसके परिवार को जेल में डाल दिया जाय ।
शिष्य—जो आज्ञा । [ चला जाता है । ]
टिप्पणी—कालपाशिकः, दण्डपाशिकः—ये दोनो बधिक है। कालपाशः प्रहरणमस्य, दण्डपाशौ प्रहरणो अस्य इति कालपाश, दण्डपाश + ठञ्—इक् । प्रख्याप्य—प्रख्यात या घोषित करके । प्र √ख्या + णिच्, पुक् + क्त्वा—ल्यप् । सनिकारम्—तिरस्कार के साथ । नि √कृ + घञ् भावे = निकारः । तेन सह यथा तथा सनिकारम् क्रियाविशेषणत्वात् द्वितीया । अस्मच्छरीरम्—इसका तात्पर्य चन्द्रगुप्त से है। यहाँ ‘क्रुधद्रुहोरुपसृष्टयोः कर्म’ सूत्र से कर्मसंज्ञा—द्वितीया हुई । अभिद्रोग्धुम्—द्रोह करने के लिये । अभि √द्रुह् + तुमुन् । आरोप्यताम्—आ √रुह् = णिच्, हस्य पः + लोट् कर्मणि—ताम् । गृहजनश्चास्य······प्रवेश्यताम्—इसका फल आगे चौथे अंक में यह दिखाया गया है कि ‘तव च पुत्रदारैः सह समागमः’ ऐसा राक्षस