भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 488 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 172
प्रथमोऽङ्कः७१

चाणक्य—[अंगूठी की छाप से युक्त पत्र सौंपकर] जाओ। तुम्हें कार्य में सफलता मिले।

सिद्धार्थक—जो आज्ञा। [चला जाता है।]

[प्रवेश करके]

शिष्य—आचार्य! कालपाशिक और दण्डपाशिक आप से निवेदन करते हैं कि महाराज चन्द्रगुप्त की इस आज्ञा का पालन किया जा रहा है।

चाणक्य—बहुत ठीक। वत्स! अब मैं सेठ जौहरी चन्दनदास को देखना चाहता हूँ।

शिष्य—जो आज्ञा। [निकलकर पुनः चन्दनदास के साथ प्रवेश करके] सेठ जी, इधर से आइए, इधर से।

टिप्पणीअपि—यहाँ सम्भावनार्थक अव्यय है। 'गर्हासमुच्चयप्रश्नशङ्का-सम्भावनास्वपि' इत्यमरः। गृह्येत—वशीभूतो भवेत्। अत्र सम्भावनायां लिङ्। √ग्रह्+लिङ्—इत कर्मणि = गृह्येतगृहीतः—यह तीसरा गण्ड या पताकास्थान हैं। सहर्षम्, आत्मगतम्—ये दोनों क्रियाविशेषण हैं। हन्त—यहाँ हर्षसूचक अव्यय है। साङ्गुलिमुद्रम्—अङ्गुलिमुद्रया सह वर्तमानः—साङ्गुलिमुद्रः 'तेन सह'—इति बहुव्रीहि स०, तम्। यह 'लेखम्' का विशेषण है।

चन्दनदासः—[स्वगतम्]

चाणक्कम्मि अअरुणे सहसा सद्दायिदस्स लोअस्स।
णिद्दोसस्स वि सङ्का किं उण मह जाददोसस्स ॥२१॥

ता भणिदा मए घणसेणप्पमुहा णिअणिवेससंठिआ—कदावि चाणक्कहदओ गेहं विचिण्णावेदि। ता अवहिदा णिव्वहध भट्टिणो अमच्चरक्खसस्स घरअणम्। मह दाव जं होदि तं होदु त्ति।

(चाणक्येऽस्मिन्नकरुणे सहसा शब्दायितस्य लोकस्य।
निर्दोषस्यापि शङ्का किं पुनर्मम जातदोषस्य ॥

तस्माद्भणिता [....]खाः निजनिवेशसंस्थिताः-

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक) · पृष्ठ 172, कुल 488 में से · BharatKosha