मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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प्रथमोऽङ्कः
कष्टम् । सर्वमेव तन्त्रमाकुलीभूतम् । तेऽपि खलु भद्रभटप्रभृतयः प्रथम- तरमुषस्येवापक्रान्ताः ।
हिन्दी अनुवाद—[नेपथ्य में कोलाहल]
चाणक्य—शार्ङ्गरव शार्ङ्गरव !
[ प्रवेश करके ]
शिष्य—आचार्य ! आज्ञा दीजिए ।
चाणक्य—पता लगाओ, यह क्या हो रहा है ।
शिष्य—[बाहर जाकर और पता लगाने पर घबड़ाये हुए भीतर आकर ] आचार्य ! यह तो सिद्धार्थक वध किये जाते हुए शकटदास को वधस्थान से लेकर भाग गया है ।
चाणक्य—[ मन में ] वाह सिद्धार्थक ! वाह ! तुमने कार्य प्रारम्भ कर दिया है । [प्रकट] क्या जबर्दस्ती भाग निकला ? [क्रोध के साथ] वत्स ! भागुरायण से कहो कि शीघ्र पकड़ लाए ।
[ बाहर जाकर और ( फिर ) भीतर आकर ]
शिष्य—[ कष्ट के साथ ] आचार्य ! बडा अनर्थ हुआ ! भागुरायण भी भाग गया ।
चाणक्य—[ मन में ] कार्य सिद्ध करने के लिए जाए । [ प्रकट । मानो क्रोध के साथ] वत्स ! मेरी ओर से भद्रभट, पुरुषदत्त, डिङ्गीरात, बलगुप्त, राजसेन, रोहिताक्ष और विजयवर्मा से कहो कि तुरन्त पीछा करके दुष्ट भागुरायण को पकड़ लें ।
शिष्य—जो आज्ञा । [ बाहर जाकर पुनः भीतर आकर खेद के साथ ] अनर्थ ! महान् अनर्थ !! सम्पूर्ण राष्ट्र अस्त-व्यस्त हो गया है । वे भद्रभट आदि भी बहुत पहले तड़के ही भाग गए ।
टिप्पणी—विभाव्य—विचिन्त्य । पता करके । वध्यभूमेः—मृत्यु-दंड (शूली, फाँसी आदि) देने के स्थान से । अत्र अपादाने पञ्चमी । समपक्रान्तः—पलायितः । भाग गया । प्रसह्य—हठात् । यह एक अव्यय है । त्वरितम्—शीघ्रम् । सम्भावय—निगृह्य शीघ्रमानय इति वाह्यार्थः, त्वमपि तेन सार्द्धं कार्यं