मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
पृष्ठ 191, कुल 488 में से
संदर्भ में पढ़ें६४ मुद्राराक्षसम्
व्याख्या—उज्ज्वलदानशक्तिम्—उज्ज्वला प्रशस्या दानशक्ति वदान्यता यस्य तादृशम् (गजपक्षे उज्ज्वला प्रभूता दानशक्ति मदजलक्षरणसामर्थ्यं यस्य तादृश), एकचरम्—एक सहायहीन (गजपक्षे यूथहीन) चरतीति त तथोक्तम्, उम्रेकिना—उद्रिक्तेन, मदबलेन—दर्पप्रभावेण (गज-पक्षे दानवारिप्रभावेण), स्वच्छन्द—निरङ्कुश, विगाहमान—भ्रमन्त, (भवन्तम्) आरण्यक—वन्य, गजमिव—हस्तिनमिव, बुद्ध्या—धिया, निगृह्य—आयत्तीकृत्य, वृषलस्य—चन्द्रगुप्तस्य, कृते—निमित्त, क्रिया-याम्—अमात्यकर्मणि (गजपक्षे भारवहनकर्मणि), प्रगुणीकरोमि—नियो-जयामि ॥२७॥
हिन्दी अनुवाद—[उठकर आकाश में सामने उपस्थित की तरह देखते हुए] अभी मैं दुष्ट भद्रभट आदि को पकड़ता हूँ। [मन में] दुष्ट राक्षस ! अब कहाँ जाओगे ? यह मैं शीघ्र ही तुमको—
प्रशंसनीय दान-शक्ति वाले (गज-पक्ष में प्रचुर मद-जल बहाने की सामर्थ्य वाले), अकेले विचरण करने वाले और अत्यधिक गर्व (गज-पक्ष में मदजल) के प्रभाव से स्वच्छन्द घूमने वाले (तुमको) जंगली हाथी की तरह बुद्धि से वशीभूत करके चन्द्रगुप्त के लिए मन्त्रित्व-कर्म (गज-पक्ष में बोझा ढोने के काम) में लगाता हूँ ॥२७॥
[सभी पात्र रङ्गमंच पर से चले जाते हैं।]
॥ मुद्रा-लाभ नामक प्रथम अङ्क समाप्त ॥
टिप्पणी—एष आहरामि—यह वाक्य शिष्य को भ्रम में डालने के लिए कहा गया है, वैसे तो कार्यवश चाणक्य की प्रेरणा से ही भद्रभट आदि ने पलायन किया है। उज्ज्वलदानशक्तिम्—जिसकी दान-शक्ति प्रकाशमान हो। गज-पक्ष में दान का अर्थ है मद। 'दानं गजमदे त्यागे पालनच्छेदशुद्धिषु' इति मेदिनी। एकचरम्—एकं चरति इति एक√चर्+अच् कर्तरि=एकचर, तम्। विगाहमानम्—घूमते हुए। वि√गाह्+शानच् कर्तरि, मुगागम=विगाह-मान, तम्। आरण्यकम्—जंगली। अरण्ये भव इति अरण्य+वुञ्—अक=आरण्यक, तम्। इस श्लोक में उपमा अलंकार है, वैदर्भी रीति