भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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१२६ | मुद्राराक्षसम्

आपकी राक्षस के प्रति अत्यन्त कृपा का स्मरण करता हूँ। जो (आप) ऐसे समय मे—

जहाँ (समरांगण मे) ऐसी बादल-सी नील वर्ण वाली गज-पंक्ति घूम रही है, वहाँ (उसको विनष्ट करने के लिए) राक्षस जावे, तेजी से बहते हुए जल की गति के समान गतिवाली अश्व-सेना को राक्षस रोके और पैदलों की सेना को राक्षस विनष्ट करे—इस प्रकार मुझे आज्ञा देते हुए प्रीति के कारण नगर मे हजारो राक्षसो के समान स्थित (मुझे) मानते थे ॥१४॥

टिप्पणीआवेगेन—क्रोधेन । अलम्—व्यर्थम् । सास्रम्—अश्रुपूर्णनेत्रं यथा स्यात् तथा । क्रियाविशेषणत्वात् द्वितीया नपुंसकत्वं च । प्रमादातिशयम्—प्रमादस्य प्रमत्तताया अतिशयम् आधिक्यम् । मेघनीला—मेघ इव नीला 'उपमानानि सामान्यवचने' इत्यनेन उपमितसमास । गजघटा—दे० श्लोक १३ की टिप्पणी । पत्तीनाम्—पैदलों । पद्यन्ते इति √पद् + क्तिच् वा औणादिक क्ति कर्तरि = पत्तयः, तेषाम् । 'पदातिपत्तिपदगपादातिकपदाजय' इत्यमरः । मह्यम्—अत्र 'क्रियया यमभिप्रैति सोऽपि सम्प्रदानम्' इत्यनेन सम्प्रदानसंज्ञा—चतुर्थी । इस पद्य मे लुप्तोपमा अलंकार वाच्योत्प्रेक्षा अलंकार के साथ संसृष्ट है । इसमे ओज गुण है, लाटी रीति है और स्रग्धरा छन्द है । इस छन्द का लक्षण १, १ मे देखिए ॥१४॥

ततस्ततः ?

विराधगुप्त—तत समन्तादुपस्रुद्ध पुष्पपुरमवलोक्य, बहुदिवसप्रभृति महदुपरोधवैशशमुपरि पौराणा परिवर्तमानमसहमाने, तस्यामप्यवस्थाया पौरजनापेक्षया सुरङ्गामेत्यापक्रान्ते तपोवनाय देवे सर्वार्थसिद्धौ, स्वामिविरहात् सुशिथिलीकृतप्रयत्नेषु युष्मद्वलेषु, जयघोषणाव्याघातादिसाहसानुमितान्तर्नगवामिषु, पुनरपि नन्दराज्यप्रत्यानयनाय सुरङ्गया बहिरपगतेषु युष्मासु चन्द्रगुप्तनिधनाय युष्मत्प्रयुक्त्या विषकन्यया घातिते तपस्विनि पर्वतेश्वरे—

व्याख्याततः—तदनन्तर, समन्तात्—चतुर्दिक्षु, उपरुद्ध—सैन्याक्रान्त, कुसुमपुरम्, अवलोक्य—दृष्ट्वा, बहुदिवसप्रभृति—अनेकवासरान् यावत्, पौराणा—नागरिकाणाम्, उपरि, महत्—बहुलम्, परिवर्तमान—प्रतिदिननूत-