मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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साहस—बल या हठ से किया जान वाला कार्य। सहसा कृतम् इति साहस - अण्।
राक्षस —सखे ! पश्याश्चर्यम्—
कर्णेनेव विषाङ्गनैकपुरुषव्यापादिनी रक्षिता
हन्तुं शक्तिरिवार्जुनं बलवती या चन्द्रगुप्तं मया।
सा विष्णोरिव विष्णुगुप्तहतकस्यात्यन्तिकश्रेयसे
हैडिम्बेयमिवेत्य पर्वतनृपं तद्वध्यमेवावधीत् ॥ १५ ॥
अन्वय —कर्णेन इव मया अर्जुनम् इव चन्द्रगुप्तम् हन्तुम् बलवती एक-पुरुषव्यापादिनी शक्ति ( इव ) या विषाङ्गना रक्षिता, सा विष्णो इव विष्णु-गुप्तहतकस्य आत्यन्तिकश्रेयसे तद्वध्यम् हैडिम्बेयमिव पर्वतनृपम् एव एत्य अवधीत् ॥ १५ ॥
व्याख्या—कर्णेन इव—राधेयेन इव, मया—राक्षसेन, अर्जुनम् इव—गाण्डीविनम् इव, चन्द्रगुप्तम्, मौर्यम्, हन्तुम्, मारयितुम्, बलवती—प्रबला, एक-पुरुषव्यापादिनी—एकम् एकमेव पुरुषं जनं व्यापादयति हन्ति या तादृशी, शक्ति —इन्द्रप्रदत्तशक्तिनामास्त्रविशेष ( एकघ्नी इव ), या विषाङ्गना—विष-कन्यया, रक्षिता—स्थापिता, सा, विष्णो इव—भगवत इव, विष्णुगुप्तहतकस्य—चाणक्यस्य, आत्यन्तिकश्रेयसे—अधिककल्याणाय, तद्वध्यम्—तस्य विष्णो पक्षा-न्तरे तस्य चाणक्यस्य वध्यं घात्यं, हैडिम्बेयम् इव—हिडिम्बासुतं घटोत्कचमिव, पर्वतनृपम्—पर्वतकम्, एव, एत्य—प्राप्य, अवधीत्—विनाशितवती ॥१५॥
हिन्दी अनुवाद—राक्षस—मित्र ! आश्चर्य तो देखो—
कर्ण के समान मैंने अर्जुन के समान चन्द्रगुप्त को मारने लिये प्रबल तथा एक ही व्यक्ति का वध करने वाली शक्ति (बाणविशेष) के समान जिस विषकन्या को रख छोड़ा था, उसने विष्णु के समान दुष्ट चाणक्य के अत्यन्त कल्याण के लिये विष्णु के वध्य (पक्षान्तर में चाणक्य के वध्य) घटोत्कच के समान राजा पर्वतक को ही प्राप्त करके मार दिया ॥ १५ ॥
टिप्पणी—पश्य—समझो, क्योकि दृश् धातु का प्रयोग ज्ञान अर्थ मे भी किया जाता है। एकपुरुषव्यापादिनी—एकः पुरुषः कर्मधारय स०, तम्