मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४६ मुद्राराक्षसम्
व्याख्या—अर्धराज्यहर —राज्यार्धभाक्, ( पर्वतक ) घातित —व्यापादित , ( तद्वधजनितम् ) अपश —कलङ्क , परिहृतम्—दूरीकृतम्, अस्मासु—मयि, पातित च—आरोपित च । यस्य तव, एकमपि—अद्वितीयमपि, नीतिबीज—जीवसिद्धिनिष्कासनात्मकं नीतिहेतु, बहुफलताम्—अनेकफलत्वम्, एति—प्राप्नोति ॥ १६ ॥
हिन्दी अनुवाद—राक्षस—मित्र ! प्रारम्भ किया हुआ कार्य छोड़ने योग्य नहीं है, यह तो आपके समक्ष ही है। तब क्या हुआ ?
विराधगुप्त—तब से लेकर दुष्ट चाणक्य चन्द्रगुप्त के शरीर के बारे में हजार गुने सावधान रहते हुए, इन्ही ( लोगो ) से ऐसा होता है—यह मानकर कुसुमपुर में रहने वाले आपके विश्वस्त पुरुषो को ढूंढकर कैद कर लिया।
राक्षस—[ उद्वेग के साथ ] मित्र बताओ, बताओ किन-किन को पकड़ लिया है ?
विराधगुप्त—अमात्य ! सबसे पहले तो क्षपणक जीवसिद्धि को नगर से अपमानपूर्वक निर्वासित कर दिया है।
राक्षस—[ मन मे ] इतना सह्य है, ( क्योकि ) विषयासक्ति से रहित को स्थान-परित्याग पीड़ित नही करेगा। [ प्रकट ] मित्र ! किस अपराध में यह निकाला गया ?
विराधगुप्त—इस दुष्ट ने राक्षस के द्वारा प्रयुक्त विषकन्या से पर्वतेश्वर का वध कराया ।
राक्षस—[ मन मे ] वाह कौटिल्य ! वाह। आधे राज्य के भागी को मरवा दिया, कलंक को मिटा दिया और मुझ पर ( उस कलंक को ) लाद भी दिया। जिस तुम्हारी नीति का एक ही बीज नाना भांति के फलो को प्राप्त कर रहा है ॥ १६ ॥
टिप्पणी—प्रत्यक्षमेव—समक्षमेव। अक्ष=इन्द्रिय। अक्षाणि प्रतिगतम् इति प्रत्यक्षम् प्रादितत्०। अथवा अक्ष्णो आभिमुख्यम् इत्यर्थे ‘लक्षणेनाभिप्रती—’इत्यनेन अव्ययीभावसमास, ‘प्रतिपरसमनुभ्योऽक्ष्ण’ इत्यनेन समासान्तटच्प्रत्यय। सहस्रगुणम्—सहस्र गुणा यस्मिन् कर्मणि तत् यथा स्यात्