मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४८ | मुद्राराक्षसम्
जीवनेच्छाम्, आलम्ब्य—आश्रित्य, कृतघ्नै—कृतोपकारानभिज्ञै, अस्माभि, पर-लोकगत—लोकान्तर प्राप्त, देव—स्वामी नन्द इत्यर्थ, न अनुगम्यते—न अनुस्रियते ॥ २० ॥
हिन्दी अनुवाद— [ प्रकट ] उसके बाद ?
विराधगुप्त— तब चन्द्रगुप्त के शरीर को विनष्ट करने के लिए इसने दारुवर्मा आदि को प्रेरित किया—यह (बात) नगर में प्रसिद्ध कराकर शकटदास को शूली पर चढ़ा दिया गया ।
राक्षस— [ आँसू के साथ ] हाय मित्र ! शकटदास ! तुम्हारी ऐसी मृत्यु उचित नहीं है ।। अथवा, स्वामी के लिए मरे हो, तुम शोक करने योग्य नहीं हो, हम ही इस विषय में शोक करने योग्य हैं,—जो नन्द-वंश के विनष्ट हो जाने पर भी जीने की इच्छा कर रहे हैं ।
विराधगुप्त— अमात्य ! स्वामी का प्रयोजन ही सिद्ध करना चाहिए, इसलिए प्रयत्न कर रहे हैं ।
राक्षस— मित्र !—
इसी प्रयोजन का—न कि जीने की इच्छा का—आश्रय लेकर कृतघ्न हम दूसरे लोक में पहुँचे हुए स्वामी का अनुसरण नहीं कर रहे हैं ॥ २० ॥
टिप्पणी— अभिद्रोग्धुम्—अभिजिघांसितुम् । व्यापारिता—नियोजिता । प्रख्याप्य—उद्घाप्य । आरोपित—स्थापित । स्वाम्यर्थम्—स्वामी प्रभु अर्थ कारणं यस्मिन् तत् यथा स्यात् तथा । उपरत—मृत । शोच्य—अवश्यं शोचनीय इति √शुच् + ण्यत् कर्मणि 'प्य आवश्यकै' इति सूत्रेण कुत्वनिषेध । नन्दकुलविनाशेऽपि—अत्र 'यस्य च भावेन भावलक्षणम्' इति सूत्रेण भावे सप्तमी । जिजीविषाम्—जीवनेच्छाम् । जीवितुमिच्छा इति √जीव् + सन् + अ भावे = जिजीविषा, ताम् । यह 'आलम्ब्य' का कर्म है । कृतघ्नै—√कृ + क्त कर्मणि कृतम्, तत् घ्नन्ति विस्मरणेन इति कृत √हन् + क कर्तरि मूलविभुजादित्वात् = कृतघ्नाः, तै । इस श्लोक में काव्यलिंग और परिसंख्या अलंकारों की संसृष्टि है । इसमें वैदर्भी रीति है, माधुर्य गुण है, करुण रस है और अनुष्टुप् छन्द है । इस छन्द का लक्षण १, ३ में देखिए ॥ २० ॥