भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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१५८ मुद्राराक्षसम्

कदुअ, णत्थि मे पुणो पाडलिउत्तेप्पवेसो त्ति, ता इच्छामि अह अज्जस्स ज्जेव सुप्पसणे पादे सेविदु । ( जानात्येवामात्यो यथा चाणक्यहतकस्य विप्रियं कृत्वा, नास्ति मे पुन पाटलिपुत्रे प्रवेश इति, तदिच्छाम्यहममात्यस्यैव सुप्रसन्नौ पादौ सेवितुम् । )

राक्षस — भद्र ! प्रियं न , किन्तु त्वदभिप्रायपरिज्ञानेनान्तरितोऽस्माकमनुनय । तदेव क्रियताम् ।

सिद्धार्थक — [ सहर्षम् ] अणुग्गहिदोह्नि । ( अनुगृहीतोऽस्मि ।)

राक्षस — सखे शकटदास ! विश्रामय सिद्धार्थकम् ।

शकटदास — यदाज्ञापयत्यमात्य ।

[ इति सिद्धार्थकेन सह निष्क्रान्त । ]

**हिन्दी अनुवाद—राक्षस—**मित्र शकटदास ! आप अपने अधिकार ( के प्रयोग ) मे इसी मुद्रा का उपयोग करे ।

**शकटदास—**अमात्य की जो आज्ञा ।

**सिद्धार्थक—**अमात्य ! मुझे कुछ निवेदन करना है ।

**राक्षस—**विश्वासपूर्वक कहो ।

**सिद्धार्थक —**अमात्य जानते ही हैं कि दुष्ट चाणक्य की बुराई करके पाटलिपुत्र मे मेरा पुन प्रवेश नही हो सकता, इसलिए मैं चाहता हूँ कि अमात्य के ही सुन्दर चरणो की सेवा मे रहूँ ।

**राक्षस—**भद्र ! ( तुम्हारा रहना ) मुझे अभीष्ट है, किन्तु तुम्हारी इच्छा के जान लेने से मेरा अनुरोध छिप गया है । तो ऐसा करो ।

सिद्धार्थक —[ हर्ष के साथ ] अनुगृहीत हूँ ।

**राक्षस—**मित्र शकटदास ! सिद्धार्थक को विश्राम कराओ ।

**शकटदास—**अमात्य की जो आज्ञा ।

[ सिद्धार्थक के साथ बाहर चला जाता है । ]

**टिप्पणी—स्वाधिकारे—**स्वनियोगे । **व्यवहर्त्तव्यम्—**व्यवहार कार्य । वि—अव√हृ+तव्य भावे । **विप्रियम्—**विरोधम् । विभिन्न प्रियेभ्य वा

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