भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

पृष्ठ 251, कुल 488 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 251

१६२ मुद्राराक्षसम्

हिन्दी अनुवादपुरुष—[ प्रवेश करके ] अमात्य की जय हो । अमात्य ! शकटदास निवेदन करते हैं कि ये तीन विशिष्ट आभूषण बेचे जा रहे हैं, अतः अमात्य ( इन्हें ) देख लें ।

राक्षस—[ देखकर मन में ] अहा ! आभूषण तो बहुमूल्यक हैं । [ प्रकट ] भद्र ! शकटदास से कहो कि विक्रेता को सन्तुष्ट करके (ये आभूषण) ले ले ।

पुरुष—अमात्य की जो आज्ञा ।

[बाहर चला जाता है ।]

राक्षस—[ मन में ] तब तक मैं भी करभक को कुसुमपुर भेजता हूँ । [ उठकर ] क्या दुष्ट चाणक्य से चन्द्रगुप्त अलग होगा, अथवा मैं (अपने) अभीष्ट को सिद्ध हुआ ही देखता हूँ । क्योंकि—

चन्द्रगुप्त सभी राजाओं का शासक होता हुआ प्रभाव में है । चाणक्य भी मेरी सहायता से यह राजा बना है—इस अभिमान में चूर है । राज्य पा जाने से कृतार्थ एक ( चन्द्रगुप्त ) को और प्रतिज्ञारूपी सागर को पार कर लेने वाले दूसरे ( चाणक्य ) को कृतकृत्यता ही समय पाकर निःसन्देह मित्रभाव से अलग कर देगी ॥ २३ ॥

[सभी ( पात्र रंगमंच पर से ) चले जाते हैं ।]
॥ राक्षस विचार नामक दूसरा अंक समाप्त ॥

टिप्पणीअलङ्कारविशेषा —अलङ्क्रियते एभि इति अलम्√कृ+घञ् करणे=अलङ्काराः, तेषां विशेषाः । महार्हाणि—बहुमूल्यक अर्ह्यते पूज्यते इति √अर्ह्+घञ् कर्मणि=अर्हः । महान् अर्हः एषाम् इति महार्हाः । कुसुमपुराय—कुसुमपुरम् अभिलक्ष्य । अत्र 'क्रियार्थोपपदस्य'—इति सूत्रेण कर्मणि चतुर्थी । भिद्येत—वैमनस्यं प्राप्नुयादित्यर्थः । √भिद्+लिङ्—ईत कर्मणि । अयं सम्भावनायां लिङ् । यहाँ चन्द्रगुप्त और चाणक्य में फूट पड़ जाने की सम्भावना करके राक्षस 'आशा बलवती राजन् शल्यो जेप्यति पाण्डवान्' इस न्याय से चन्द्रगुप्त के वध के प्रति प्रयत्नशील हो जाता है । समीहितम्—अभिलषितम् । सम्√ईह्+क्त भावे । सर्वभूतलभुजाम्—सभी राजाओं का ।