मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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हिन्दी अनुवाद—पुरुष—[ प्रवेश करके ] अमात्य की जय हो । अमात्य ! शकटदास निवेदन करते हैं कि ये तीन विशिष्ट आभूषण बेचे जा रहे हैं, अतः अमात्य ( इन्हें ) देख लें ।
राक्षस—[ देखकर मन में ] अहा ! आभूषण तो बहुमूल्यक हैं । [ प्रकट ] भद्र ! शकटदास से कहो कि विक्रेता को सन्तुष्ट करके (ये आभूषण) ले ले ।
पुरुष—अमात्य की जो आज्ञा ।
[बाहर चला जाता है ।]
राक्षस—[ मन में ] तब तक मैं भी करभक को कुसुमपुर भेजता हूँ । [ उठकर ] क्या दुष्ट चाणक्य से चन्द्रगुप्त अलग होगा, अथवा मैं (अपने) अभीष्ट को सिद्ध हुआ ही देखता हूँ । क्योंकि—
चन्द्रगुप्त सभी राजाओं का शासक होता हुआ प्रभाव में है । चाणक्य भी मेरी सहायता से यह राजा बना है—इस अभिमान में चूर है । राज्य पा जाने से कृतार्थ एक ( चन्द्रगुप्त ) को और प्रतिज्ञारूपी सागर को पार कर लेने वाले दूसरे ( चाणक्य ) को कृतकृत्यता ही समय पाकर निःसन्देह मित्रभाव से अलग कर देगी ॥ २३ ॥
[सभी ( पात्र रंगमंच पर से ) चले जाते हैं ।]
॥ राक्षस विचार नामक दूसरा अंक समाप्त ॥
टिप्पणी—अलङ्कारविशेषा —अलङ्क्रियते एभि इति अलम्√कृ+घञ् करणे=अलङ्काराः, तेषां विशेषाः । महार्हाणि—बहुमूल्यक अर्ह्यते पूज्यते इति √अर्ह्+घञ् कर्मणि=अर्हः । महान् अर्हः एषाम् इति महार्हाः । कुसुमपुराय—कुसुमपुरम् अभिलक्ष्य । अत्र 'क्रियार्थोपपदस्य'—इति सूत्रेण कर्मणि चतुर्थी । भिद्येत—वैमनस्यं प्राप्नुयादित्यर्थः । √भिद्+लिङ्—ईत कर्मणि । अयं सम्भावनायां लिङ् । यहाँ चन्द्रगुप्त और चाणक्य में फूट पड़ जाने की सम्भावना करके राक्षस 'आशा बलवती राजन् शल्यो जेप्यति पाण्डवान्' इस न्याय से चन्द्रगुप्त के वध के प्रति प्रयत्नशील हो जाता है । समीहितम्—अभिलषितम् । सम्√ईह्+क्त भावे । सर्वभूतलभुजाम्—सभी राजाओं का ।