मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ मुद्रा राक्षसम्
याणि, प्रसभ—हठात्, पटुता—कार्यक्षमता, त्यजन्ति—जहन्ति। ये करणे — ज्ञानेन्द्रियै, रूपादीन्—रूपरसगन्धस्पर्शशब्दान्, विषयान्—अर्थान्, निरूप्य—अवधार्य, त्वया—भवत्या, आत्मलाभ — स्वजन्म, लब्ध — अधिगत, तेषु—आत्मलाभोपायभूतेषु, चक्षुरादिषु—नेत्रप्रभृतिषु इन्द्रियेषु, अपि, स्वार्थावबोधक्रिया — स्वार्थस्य निजविषयस्य रूपादे य अवबोध ज्ञान तद्रूपा क्रिया व्यापारा, हृता — नष्टा। जरया—वार्धक्येन, तव—ते, मूर्ध्नि—मस्तके, एव, पद—चरण, न्यस्तम्—स्थापितम् ॥ १ ॥
हिन्दी अनुवाद—[ तत्र कञ्चुकी प्रवेश करता है । ]
कञ्चुकी—[ नैराश्य के साथ ] हे तृष्णे ! ( तुम ) व्यर्थ मे प्रसन्न हो रही हो। ( क्योकि ) तुम्हारी आज्ञा का पालन करने वाली कर्मेन्द्रियां तेजी से कार्यक्षमता को छोड़ रही हैं। जिन इन्द्रियो से रूप आदि विषयो को ग्रहण करके तुमने अपना अस्तित्व लाभ किया, उन नेत्र आदियो मे भी अपने (-अपने ) विषय के ज्ञान को प्राप्त करने की क्रियाये नष्ट हो गई। ( इतना ही नही ) बुढ़ापे ने तुम्हारे सिर पर ही पाव रख दिया है ॥ १ ॥
टिप्पणी—इस अंक मे नियताप्ति अवस्था और चौथे अंक मे प्रकरी अर्थप्रकृति के वर्णन होने से इन दोनो अंकों मे विमर्शसंधि है। विमर्शसंधि का लक्षण यह है—'गर्भनिर्भिन्न प्रसिद्धस्य बीजार्थस्यावमर्शनम् । हेतुना येन केनापि विमर्शः संधिरुच्यते ॥' इस संधि के तेरह अंग होते हैं। जैसे—'तत्रापवादसम्फेटौ विद्रवद्रवशक्तयः । द्युतिप्रसङ्गश्छलनं व्यवसायो निरोधनम्। प्ररोचना विचलनमादानञ्च त्रयोदश ॥' सनिर्वेदम्—निराशा या वैराग्य के साथ । निर्√विद्+घञ् भावे=निर्वेद । तेन सह इति सनिर्वेदम् । मुधा—व्यर्थ । यह एक अव्यय है । आज्ञाविधेयानि—आज्ञापालकानि वि√धा+यत् कर्मणि=विधेयानि । आज्ञाया विधेयानि षष्ठीतत्० । अङ्गानि—यहाँ हाथ, पैर आदि कर्मेन्द्रियो से तात्पर्य है । प्रसभम्—हठात्, तेजी से । प्रगता सभा विचार अस्मात् इति प्रसभम् प्रादिबहुव्रीहि स०, तत् यथा स्यात् तथा । क्रियाविशेषणमेतत् । करणे — इन्द्रियै । यहाँ ज्ञानेन्द्रियों से तात्पर्य है। क्रियते एभि इति√कृ+ल्युट् करणे=करणानि, तै । करणे तृतीया । आत्मलाभ—आत्मन निजरूपस्य लाभ । जरया—वृद्धावस्था ने।