मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १६६ | मुद्राराक्षसम् |
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अन्वयः—सम्पूर्णेन्दुमयूखसंहतिरुचा सञ्चामराणा श्रिय- गृहीतधूपसुरभीन् पिनद्धस्रज स्तम्भान् आलिङ्गन्तु, सकुसुम चन्दनवारिणा सेक सुचिर सिंहासन-धारणात् सञ्जातमूर्च्छामिव गां क्षिप्रम् अनुगृह्लातु च ॥ २ ॥
व्याख्या—सम्पूर्णेन्दुमयूखसंहतिरुचा—सम्पूर्णा समग्र य इन्दु चन्द्र तस्य ये मयूखा- किरणा तेषा महति समुदाय तस्या म्गिव रुक् कान्ति येषा तादृशाना, सञ्चामराणा—चमरीपुच्छरत्नाना, श्रिय —द्युतय , गृहीतधूपसुरभीन्—गृहीता सेविता ये धूपा तै सुरभीन् घ्राणतर्पणान्, पिनद्धस्रज —पिनद्धा संवेष्टिता स्रज मालिका येषु तान्, स्तम्भान्—स्थूणान् आलिङ्गन्तु—उपश्लिष्यन्तु । सकुसुम —पुष्पयुक्त , चन्दनवारिणा—मलयजलेन, सेक —सेचन, सुचिर—दीर्घकालात्, सिंहासनधारणात्—सिंहाङ्कस्य सिंहचिह्नितस्य आसनस्य सिंहासनस्य इत्यर्थ धारणात् वहनात्, सञ्जातमूर्च्छामिव—सञ्जाता समुत्पन्ना मूर्च्छा वैक्लव्य यस्या तादृशीम् इव, गा—पृथ्वी, क्षिप्र—झटिति, अनुगृह्णातु च—अनुकम्पताम् च ॥ २ ॥
हिन्दी अनुवाद—[ घूमकर आकाश की ओर ( दृष्टिपात करते हुए ) ] हे हे सुगांग-भवन मे नियुक्त पुरुषो ! प्रात स्मरणीय महाराज चन्द्रगुप्त तुम लोग को इस प्रकार आज्ञा दते हैं ( कि )—'प्रारम्भ किये गये कौमुदीमहोत्सव से अयंत रमणीय कुसुमपुर को देखना चाहता हूँ । इसलिए मेरे देखने योग्य -सुगांग भवन के ऊपरी भाग को सजा दो' । तो तुम लोग देर क्यो कर रहे हो ? [ आकाश में ( उत्पन्न शब्दो को ) सुनकर ! ] क्या कहते हो कि आर्य ! क्या महाराज चन्द्रगुप्त को कौमुदीमहोत्सव का निषेध ज्ञात नहीं है ? ओह ! भाग्य के मारे हुओ ! तुम्हे इस प्राणनाशक वार्ता के प्रसग से क्या ( मतलब ) ? अभी शीघ्र—
पूर्ण चन्द्र की किरणों के समूह की कान्ति वाले उत्तम चँवरो की छटायें धूपो के सेवन से सुवासित तथा बांधी हुई मालाओ से युक्त स्तम्भो का आलिंगन करें और पुष्प-समन्वित चन्दन-जल का छिड़काव चिरकाल से सिंहासन धारण करने के कारण मानो मूर्च्छा श प्राप्त पृथ्वी को शीघ्र ही अनुगृहीत करे ।
टिप्पणी—कौमुदीमहोत्सव—कार्तिकी पूर्णिमा को होने वाला उत्सव । कौ पृथिव्या मोदते इति कु√मुद्+क कर्तरि = कुमुदम् । तस्य इयम् इति